विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति, उत्तर प्रदेश के तत्वावधान में 12 अप्रैल को लखनऊ में आयोजित सभी घटक संगठनों की केंद्रीय कार्यकारिणी की
संयुक्त बैठक में लिए गए महत्वपूर्ण निर्णय के अनुसार 15 अप्रैल से 21 मई तक प्रदेशभर में चलाए जाने वाले व्यापक “जन-जागरण अभियान” के तहत उपभोक्ताओं और किसानों को प्रबंधन के मनमाने रवैया से बिजली व्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्प्रभाव से अवगत कराया जाएगा।
उन्होंने बताया कि प्रदेश के अनेक जनप्रतिनिधियों ने भी पावर कॉर्पोरेशन प्रबंधन द्वारा मनमाने ढंग से लागू की जा रही वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग पर गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए इसे वापस लेने की मांग की है।
इसके बावजूद प्रबंधन निजीकरण की दिशा में कदम बढ़ाते हुए इसे चरणबद्ध तरीके से विभिन्न शहरों में लागू कर रहा है। संघर्ष समिति ने बताया कि पूर्वांचल एवं दक्षिणांचल विद्युत वितरण निगमों के निजीकरण का निर्णय नवंबर 2024 में लिया गया था,
जिसका कर्मचारी लगातार विरोध कर रहे हैं। वहीं अब वर्टिकल रिस्ट्रक्चरिंग का प्रयोग पश्चिमांचल एवं मध्यांचल विद्युत वितरण निगमों में तेजी से किया जा रहा है।
पश्चिमांचल के सहारनपुर, मेरठ, गाजियाबाद एवं नोएडा जैसे महत्वपूर्ण शहरों तथा मध्यांचल के अंतर्गत राजधानी लखनऊ सहित अयोध्या और बरेली में इसे लागू किया जा चुका है।
इस व्यवस्था के लागू होने के बाद उपभोक्ताओं को भारी असुविधाओं का सामना करना पड़ रहा है। एक ओर उपभोक्ता यह समझ नहीं पा रहे हैं कि
“किस कार्य के लिए किस कार्यालय से संपर्क करें, जिससे उन्हें अनावश्यक भटकना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर वर्षों से कार्यरत अनुभवी संविदा कर्मियों की छंटनी कर दी गई है, जिससे विशेष रूप से वितरण तंत्र के रखरखाव (मेंटेनेंस) पर गंभीर प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।”
संघर्ष समिति ने आरोप लगाया कि प्रबंधन के इस रवैये से जहां उपभोक्ता परेशान हैं, वहीं शांतिपूर्ण आंदोलन कर रहे बिजली कर्मियों पर उत्पीड़नात्मक कार्यवाहियां तेज कर दी गई हैं।
निजीकरण के विरोध में चल रहे आंदोलन के 502 दिन पूर्ण होने पर संघर्ष समिति के स्थानीय पदाधिकारियों द्वारा प्रदेश के विभिन्न जनपदों एवं परियोजनाओं में सभाएं आयोजित कर 12 अप्रैल के निर्णयों की जानकारी दी गई तथा आंदोलन को और सशक्त बनाने का आह्वान किया गया।


