लोगों ने “लूट” का अर्थ कुछ और ही समझ लिया। राम के नाम पर ही लूटने लगे। कुछ लोग “राम” का “विरोध” कर सत्ता पा गए, तो कोई राम के “नाम” पर सत्ता पर काबिज़ हुआ।
“कुर्ते के ऊपर जनेऊ” पहनने वाले ऐसे “पंडित” भी हैं जो न खुल कर राम का नाम लेते हैं और न खुलकर विरोध ही करते हैं। फिर भी सत्ता के लिए राम का सहारा ले ही लेते हैं ।
राम नाम की लूट है, लूट सके तो लूट, अंत समय पछतायेगा, प्राण जाएंगे छूट.. यह दोहा भक्ति की दुनिया का ऐसा नगाड़ा है जो सीधा भीतर बजता है।
इसका अर्थ कोई जेबकतरी वाली लूट नहीं, बल्कि अवसर की खुली दुकान है। जहाँ “राम नाम” बिना कीमत के बँट रहा है, जितना चाहो, समेट लो।
“राम नाम की लूट है” यहाँ “लूट” शब्द बड़ा दिलचस्प है। जैसे कोई मिठाई फ्री बाँट दे और लोग झोली भर लें, वैसे ही भक्ति, नाम-स्मरण, सद्कर्म ये सब खुले हैं, बस उठाने की देर है।
“लूट सके तो लूट” मतलब अभी समय है, सांस चल रही है, अभी मन जाग सकता है। जो करना है, अभी कर लो, क्योंकि बाद में पछतावे का कोई रिफंड काउंटर नहीं होता।
“अंत समय पछतायेगा” जब जीवन की घड़ी धीमी हो जाती है तब इंसान को अपने छूटे हुए मौके याद आते हैं। जैसे खाली जेब देखकर मेले से लौटता बच्चा।
“प्राण जाएंगे छूट” अंततः शरीर साथ छोड़ देगा, सांस विदा लेगी और तब कोई भी अधूरा काम पूरा करने का मौका नहीं बचेगा।
यह दोहा सीधा-सा संदेश देता है। अच्छे कर्म, ईश्वर का स्मरण और आत्मिक साधना को टालने की आदत मत बनाइए। वक्त एक चुपचाप बहती नदी है। जब तक पैर पानी में हैं तैरना सीख लो…
@ गंवार…


