छुट्टी पर प्रधानमन्त्री, मौज मस्ती में मोदी! : बादल सरोज (PART-2)

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी

फोटो शूट करवाने की उनकी आसक्ति कितनी अधिक है, यह बात 14 फरवरी, 2019 को हुए पुलवामा आतंकी हमले के दौरान देखी भी जा चुकी है और जम्मू-कश्मीर के तत्कालीन राज्यपाल एवं प्रशासक सतपाल मलिक द्वारा दर्ज भी की जा चुकी है।

मलिक ने बताया था कि जब पुलवामा पर हमला हुआ था, उस समय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जिम कॉर्बेट नेशनल पार्क में डिस्कवरी चैनल के लिए एक शूटिंग में व्यस्त थे।

यह काम उन्हें इतना जरूरी लगा था कि दोपहर 3 बजकर 10 मिनट पर इस आतंकी हमले की खबर आने के बाद भी वे शाम करीब 6:30 बजे तक बोट सफारी और फोटोशूट करवाते रहे थे।

इन मौज मस्ती की यात्राओं के अलावा इसी दौरान बाकी का समय मोदी जी ने उस काम – चुनाव अभियान – में लगाया, जिसमें वे सिद्धहस्त और पारंगत दोनों हैं।

हाल में निबटे 2026 के पांच राज्यों-पश्चिम बंगाल, असम, तमिलनाडु, केरल और पुडुचेरी-के विधानसभा चुनावों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कुल 23 चुनावी रैलियां और रोड शो किए।

मोदी का सबसे अधिक ध्यान पश्चिम बंगाल पर रहा, जहाँ उन्होंने सबसे ज्यादा 18 रैलियां और रोड शो किये। असम में 2, तमिलनाडू, केरल और पूदुचेरी में एक-एक रैली की।

चुनावी आमसभाओं में घनगरज उनका प्रिय शगल रहा है और यह लगातार बढ़ता जा रहा है। 2024 के लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी ने कुल 206 रैलियां, रोड शो और जनसभाएं कीं थीं।

यह संख्या 2019 में की गई 142 रैलियों की तुलना में 64 अधिक थी, जो एक नया रिकॉर्ड है। प्रायोजित टीवी और मीडिया में दिए 80 से अधिक इंटरव्यूज इसके अलावा हैं।

विदेशी यात्राओं की आधिकारिक सूची पीएमओ की वेबसाइट पर नियमित रूप से अपडेट की जाती है, लेकिन घरेलू यात्राओं के कुल दिनों का नवीनतम आंकड़ा सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध नहीं है। सिर्फ 2018 तक की रिपोर्ट है, जो 313 दिनों तक मोदी के दिल्ली में न रहने का उल्लेख करती है।

अगर देश का प्रधानमंत्री यही सब कर रहा है तो फिर प्रधानमंत्री का काम कौन कर रहा है? अगर यही मौज मस्ती, फोटो बाजी, पर्यटन और चुनावी रैलियाँ ही प्रधानमंत्री का काम है, तो सवाल उठता है कि वो कौन है, जो असल में वह काम कर रहा है, जिसके लिये प्रधानमंत्री नियुक्त किया जाता है।

देश के सामने दरपेश सवालों पर कैबिनेट की मीटिंग करके रास्ते निकालने और जरूरी कदम उठाने का काम कौन कर रहा है–और अगर कर रहा है, तो किस अधिकार से कर रहा है?

ध्यान रहे, ये वही प्रधानमंत्री हैं, जिनके बारे में उनकी भक्त मंडली दावा करती है कि वे कभी छुट्टी नहीं लेते, कि वे 18-18 घंटे काम करते हैं!!

यह सिर्फ देश के भीतर के पर्यटन भर का मामला नहीं है, मोदी के नाम भारत के सबसे अधिक विदेश यात्रा करने वाले प्रधानमंत्री का रिकॉर्ड भी है।

अभी तक वे 99 अंतर्राष्ट्रीय यात्राएं कर चुके हैं, जिसमें वे 79 से अधिक देशों में , कईयों में दो-दो, तीन-तीन बार भी गए।

वर्ष 2014 में पदभार ग्रहण करने के बाद से वे पृथ्वी के 7 महाद्वीपों में से 6 महाद्वीपों की यात्रा कर चुके है। इस मामले में उनका जो रिकॉर्ड है, वह दुनिया के किसी भी राजनेता के नाम नहीं होगा।

सातवें महाद्वीप अन्टार्कटिका भी वे जाते-जाते रह गए। अप्रैल 2025 में, चिली–जिसे अंटार्कटिका का प्रवेश द्वार माना जाता है-के राष्ट्रपति ने उन्हें अंटार्कटिका का दौरा करने के लिए आमंत्रित किया था,

इसलिए यह मानकर चला जाना चाहिए कि वे इस महाद्वीप को भी जाए बिना नहीं छोड़ेंगे, वहां भी फोटो शूट करवाकर ही मानेंगे।

इसी महीने मई 2026 में वे चार यूरोपीय देशों-नॉर्वे, स्वीडन, नीदरलैंड और इटली-की यात्रा पर जाने वाले हैं। यह यात्रा 15 से 20 मई के बीच निर्धारित है, जो यूरोपीय संघ के साथ हालिया समझौते के बाद उनकी पहली यूरोप यात्रा है।

एक रिपोर्ट के मुताबिक उनकी अब तक की विदेश यात्राओं पर कोई 66 अरब रुपयों का खर्चा हो चुका है।प्रधानमंत्री की विदेश यात्राओं पर खर्च ज्यादा मायने नहीं रखता।

मायने वह हासिल रखता है, जो इन यात्राओं के बाद हुआ होता है। संसदीय लोकतंत्र में हर विदेश यात्रा के बाद प्रधानमंत्री संसद के जरिये पूरे देश को यह बताया करते थे,

उस यात्रा में उन्होंने क्या किया, किन मुद्दों पर चर्चा हुई, देश को क्या मिला? मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद से संसद को सूचित किये जाने की यह प्रथा भी समाप्त हो गई है ।

अब मास्को से लौटते हुए बीच रास्ते में अचानक फ्लाइट लाहौर की तरफ मुड़ जाती है और भारत का प्रधान मंत्री, बिन बुलाये मेहमान के रूप में पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ की नवासी की शादी में बनारसी साड़ियों और पठानी सूट्स का भात लेकर पहुँच जाता है।

उस यात्रा में क्या हुआ, यह किसी को नहीं पता चलता। पाकिस्तान और दूसरे देशों के मीडिया से पता चलता है कि चौंकाने वाली इस कूटनीति के पीछे सौजन्य कम था, विदेश नीति और भी कम थी, अडानी की बिजली और जिंदल की स्टील फैक्ट्री का लेना-देना कुछ अधिक था।

सिर्फ यहीं भर नहीं, अधिकाँश विदेश यात्राओं में प्रधानमंत्री के दल में अडानी की मौजूदगी और ऑस्ट्रेलिया से मोजाम्बिक तक हुए अडानी के धंधे से जुड़े करार इन यात्राओं की ‘उपलब्धियों’ के बारे में बता देते हैं।

विदेशों की यात्राएं उन देशों के साथ मित्रता को गाढ़ी और मजबूत करने के लिए होती हैं। नए व्यापारिक अनुबंधों और परस्पर बढ़ते-बढाते सांस्कृतिक संबंधों सहित नए गठबंधन बनाने के लिए होती हैं।

संकट में एक-दूसरे का साथ देने के वादे करने के लिए होती हैं। इतनी सारी, रिकॉर्ड तोड़ विदेश यात्राओं के बाद हासिल क्या हुआ है, यह आज पूरी दुनिया में भारत की स्थिति को देखकर पता चल जाता है।

एक भी पड़ोसी देश ऐसा नहीं है, जिसका नाम लेकर यह बताया जा सके कि उसके साथ हमारे रिश्ते सामान्य हैं। परम्परा से जिन देशों के साथ दोस्ती और विश्वास बना रहा,

वह नेपाल और बांग्ला देश तक आज हमारे साथ नहीं हैं। कम से कम उस तरह तो बिलकुल नहीं है, जिस तरह से मोदी सरकार के आने के पहले हुआ करते थे।

मोदी द्वारा अपनी यात्राओं से लगभग पूरी दुनिया नाप लेने के बाद आज वैश्विक परिदृश्य में भारत अब तक के सबसे मुश्किल मुकाम पर खडा हुआ है। न अपनी मर्जी से तेल देख पा रहा हैं, न उसकी धार देख पा रहा है।

अपने विश्वस्त और सदा-सर्वदा साथ देने वाले मित्र देशों के साथ अमरीका और इजरायल जैसे दुष्ट देशों द्वारा किये जा रहे सरासर गैरकानूनी बर्ताव पर मुंह खोलने तक का साहस नहीं कर पा रहा है। अपनी खुद की संप्रभुता पर होने वाली टीका-टिप्पणियों तक का जवाब नहीं दे पा रहा है।

इतना डरा हुआ है कि ब्रिक्स जैसे जिन साझे मंचों का अध्यक्ष है, उनमें भी नेतृत्वकारी भूमिका तक नहीं निबाह पा रहा है। इसका मतलब यही हुआ कि ज्यादातर विदेश यात्राएं या तो पर्यटन बनकर रह गयीं या अडानी-अम्बानी के व्यावसयिक हितों का माध्यम या दोनों ही बन कर रह गयीं।

कुल जमा यह कि भारत का प्रधानमंत्री अनुपस्थित है। उसे जहां होना चाहिए, वहां छोड़कर बाकी सब जगह उपस्थित है: कभी सैर सपाटों में, कभी फोटो शूट में, अक्सर चुनावी रैलियों में और बाकी बचे समय में दुनिया घूमने में व्यस्त है।

उसके पास उसी देश के बारे में कुछ अच्छा करने का वक़्त नहीं है, जिसका वह निर्वाचित मुखिया है। और ऐसा होना कतई अच्छी बात नहीं है।

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं। संपर्क : 94250-06716)

(DISCLAIMER-गोरखपुर हलचल का इससे कोई सरोकार नहीं है)

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