मसाने की होली: काशी विद्वत परिषद ने किया विरोध, कहा- श्मशान में त्योहारों की कोई जगह नहीं

काशी विद्वत परिषद काशी विद्वत परिषद

परिचय: मसाने की होली क्या है?

वाराणसी, जिसे काशी या बनारस भी कहा जाता है, अपनी अनोखी धार्मिक परंपराओं के लिए विश्व प्रसिद्ध है। यहां होली का उत्सव सामान्य रंगों से अलग एक विशेष रूप में मनाया जाता है, जिसे मसाने की होली या चिता भस्म होली कहा जाता है। यह आयोजन मुख्य रूप से महाश्मशान घाटों – मणिकर्णिका घाट और हरिश्चंद्र घाट पर होता है। रंगभरी एकादशी के अगले दिन नागा साधु, अघोरी, शिवभक्त और कुछ स्थानीय लोग जलती चिताओं की राख (भस्म) से होली खेलते हैं। यह परंपरा जीवन-मृत्यु के चक्र, वैराग्य और भगवान शिव के तांडव रूप का प्रतीक मानी जाती है। आयोजक इसे सदियों पुरानी आस्था से जोड़ते हैं, जहां भस्म लगाना मोक्ष और त्याग की याद दिलाता है।

काशी विद्वत परिषद का विरोध: शास्त्रों के अनुसार नहीं

हाल ही में इस परंपरा पर बड़ा विवाद खड़ा हो गया है। काशी विद्वत परिषद, जो संस्कृत विद्वानों और हिंदू शास्त्रों के जानकारों की प्रमुख संस्था है, ने मसाने की होली का खुलकर विरोध किया है। परिषद के अनुसार, श्मशान घाट उत्सव या त्योहार मनाने की जगह नहीं है। यहां की पवित्रता और मर्यादा को बनाए रखना आवश्यक है।

परिषद के सदस्यों, जैसे पंडित विनय पांडेय और अन्य विद्वानों ने कहा कि शास्त्रों में श्मशान में होली खेलने या चिता भस्म से उत्सव मनाने की कोई परंपरा नहीं मिलती। उन्होंने इसे अशास्त्रीय करार दिया और दावा किया कि यह महाश्मशान की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। परिषद का कहना है कि श्मशान शोक, अंतिम संस्कार और आत्मा की मुक्ति का स्थान है, न कि उत्सव का। यहां त्योहार मनाना सनातन धर्म की परंपराओं के विरुद्ध है। उन्होंने प्रशासन से इस आयोजन पर रोक लगाने की मांग भी की है, ताकि काशी की धार्मिक मर्यादा बनी रहे।

विवाद के दोनों पक्ष: परंपरा बनाम मर्यादा

एक ओर आयोजक और कुछ शिवभक्त इसे प्राचीन परंपरा बताते हैं, जो अघोर पंथ और तांत्रिक साधना से जुड़ी है। वे कहते हैं कि भस्म से होली खेलना मौत पर विजय और शिव की कृपा का प्रतीक है। यह केवल साधकों के लिए है और

इसमें महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता, ताकि सुरक्षा और मर्यादा बनी रहे।

दूसरी ओर काशी विद्वत परिषद और अन्य संगठन जैसे सनातन रक्षक दल

इसे आधुनिक चलन मानते हैं, जो हाल के वर्षों में लोकप्रिय हुआ है। उनका तर्क है कि

शास्त्रों में गृहस्थों या आम लोगों के लिए श्मशान में ऐसा उत्सव का कोई उल्लेख नहीं है।

यह परंपरा के नाम पर मर्यादा का उल्लंघन है और सनातन धर्म को कलंकित करने जैसा कार्य है।

क्या है भविष्य? प्रशासन की भूमिका

यह विवाद वाराणसी में धार्मिक भावनाओं को झकझोर रहा है।

प्रशासन ने मामले पर संज्ञान लिया है और स्थिति पर नजर रख रहा है।

यदि विद्वत परिषद की मांग मानी जाती है, तो मसाने की होली पर रोक लग सकती है। वहीं,

यदि इसे प्राचीन आस्था माना गया, तो यह जारी रह सकती है, लेकिन सीमित रूप में।

काशी जैसे पवित्र शहर में ऐसी बहसें आम हैं, जहां परंपरा और शास्त्रीय मर्यादा के बीच

संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण होता है। यह घटना हमें याद दिलाती है कि

धार्मिक आयोजनों में आस्था के साथ-साथ शास्त्रों का सम्मान भी जरूरी है।

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