दिल्ली विश्वविद्यालय में पाठ्यक्रम निर्माण की प्रक्रिया एक युद्धक्षेत्र बन गई है, जहां ज्ञान और हिंदुत्ववादी विचारधारा के बीच संघर्ष छिड़ा हुआ है। अपूर्वानंद का यह आलेख विश्वविद्यालय की अकादमिक परिषद की स्टैंडिंग कमेटी द्वारा विभिन्न विभागों पर डाले जा रहे दबाव को उजागर करता है। अर्थशास्त्र, इतिहास, राजनीति शास्त्र और अन्य विभागों में जेंडर, जाति, भेदभाव जैसे विषयों को हटाने की मांग हो रही है, जबकि विदेशी विचारकों को भारतीयतावादी नजरिए से बदलने की कोशिश की जा रही है। यह बदलाव न केवल अकादमिक स्वतंत्रता को चुनौती दे रहे हैं, बल्कि विद्यार्थियों को कूपमंडूक बनाने की साजिश भी लगते हैं।
अर्थशास्त्र और इतिहास विभाग पर स्टैंडिंग कमेटी का दबाव
अर्थशास्त्र विभाग के पाठ्यक्रम में ‘जेंडर और अर्थव्यवस्था’ इकाई पर एतराज जताया गया, खासकर ‘अपराध और जेंडर’ उपइकाई पर। कमेटी सदस्यों का तर्क था कि जेंडर का अर्थव्यवस्था से क्या लेना-देना? विभागाध्यक्ष ने समझाया कि महिलाओं पर हिंसा आर्थिक भागीदारी को प्रभावित करती है, लेकिन कमेटी नहीं मानी और पाठ्यक्रम वापस भेज दिया। इसी तरह, ‘भेदभाव का अर्थशास्त्र’ पर्चे से ‘डिस्क्रिमिनेशन’ शब्द हटाने को कहा गया, क्योंकि यह ‘कानों को अखरता है’।
इतिहास विभाग से ‘विश्व इतिहास’ के हिस्से को कम करने की मांग की गई, तर्क देते हुए कि राष्ट्र का इतिहास ही पर्याप्त है। पाठ्यक्रम का 70% भारतीय इतिहास से जुड़ा है, फिर भी कमेटी ने ‘प्राचीन भारतीय अर्थव्यवस्था और समाज’ से ‘समाज’ शब्द हटाने को कहा। लेखकों जैसे शीरीन मूसवी, इंद्राणी चटर्जी और रिचर्ड ईटन की किताबें हटाने के सुझाव दिए गए। यह सेंसरशिप ज्ञान की विविधता को सीमित कर रही है।
अन्य विभागों में हिंदुत्ववादी हस्तक्षेप
राजनीति शास्त्र विभाग से पाकिस्तान, चीन, ‘धार्मिक राष्ट्रवाद’, ‘संघ की राजनीति’ और श्रीलंका गृहयुद्ध जैसे विषय हटाने को कहा गया। समाजशास्त्र में वेबर, दुर्खेम और मार्क्स जैसे विदेशी विचारकों पर कम जोर देने की सलाह दी गई, भारतीय विचारकों और पारिवारिक मूल्यों को प्राथमिकता देने पर जोर। भूगोल विभाग से ‘आंतरिक द्वंद्व’ और ‘सामाजिक भूगोल’ हटाने की मांग, जहां अनुसूचित जातियों की सामाजिक स्थिति पर चर्चा होती है। ‘चर्च’, ‘कल्ट’ जैसे शब्दों की जगह ‘ऋषि-मुनि’ लाने का सुझाव दिया गया। पॉल ब्रास और नंदिनी सुंदर जैसे लेखकों को हटाया गया, जिन्हें दिल्ली पुलिस ने भी ‘राष्ट्रविरोधी’ करार दिया है।
पाठ्यक्रम निर्माण में रस्साकशी और अकादमिक गिरावट
पिछले 11 वर्षों से पाठ्यक्रम निर्माण में राष्ट्रवादी कुतर्कों का बोलबाला है। विभागाध्यक्षों को अपने अनुशासन की रक्षा करनी पड़ती है। कुछ समझौते करते हैं, जैसे हिंदी साहित्य में ‘भारतीयता बोध’ और ‘हिंदू नवोत्थान’ पर्चे जोड़ना
। प्रेमचंद के ‘गोदान’ पर भी एतराज, क्योंकि इसमें हिंदू चरित्र गाय हत्या करता है।
स्नातक स्तर पर ‘स्वच्छता’ और ‘प्रसन्नता’ जैसे बेकार पर्चे पढ़ाए जा रहे हैं,
जो विद्यार्थियों का समय बर्बाद करते हैं। विद्यार्थी ठगा महसूस करते हैं,
क्योंकि दिल्ली विश्वविद्यालय का नाम सुनकर आए, लेकिन अकादमिक गुणवत्ता गिर गई है।
पीएचडी में जेआरएफ को प्राथमिकता, जो रट्टेबाजी पर आधारित है।
शोध विषयों में राजनीतिक व्यक्तियों जैसे पोखरियाल पर फोकस, जो साहित्यिक योग्यता से
ज्यादा राजनीतिक प्रभाव से प्रेरित लगते हैं। सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में
यह हिंदुत्ववादी प्रभाव निजी संस्थानों जैसे अशोका या शिव नादर में नहीं दिखता।
विदेशी विश्वविद्यालयों के कैंपस में भी पाठ्यक्रम स्वतंत्र हैं।
ज्ञान के क्षेत्र में बढ़ती विषमता और भविष्य की चिंता
यह स्थिति ज्ञान में नई असमानता पैदा कर रही है। सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में ‘भारतीयतावादी’
ज्ञान, जो आधुनिक शोध से कटा है, जबकि निजी संस्थान वैश्विक शोध से जुड़े हैं।
अध्यापक अपने बच्चों को निजी विश्वविद्यालयों में भेज रहे हैं।
सार्वजनिक विश्वविद्यालयों के विद्यार्थी वैश्विक स्तर पर पिछड़ सकते हैं। ‘राष्ट्रविरोधी’ किताबें पाठ्यक्रम से हट रही हैं,
जल्द पुस्तकालयों से गायब हो जाएंगी। ज्ञान का यह संहार हिंदुओं के साथ अन्याय है,
जिन्होंने खुद को तलवार थमाई है। क्या वे अपने बच्चों की बर्बादी का अहसास करेंगे?


