एक तरफ हम चीन के मुकाबले 0% रणनीतिक तेल भंडार बढ़ा पाए हैं और दूसरी तरफ हमारी पूरी ऊर्जा एक डिग्री को छिपाने में लगी है।
प्राथमिकता का संकट: जिस देश में 30,000 करोड़ का सोना लोग ईएमआई भरने के लिए गिरवी रख रहे हों, वहाँ सरकार अपनी पूरी मशीनरी का उपयोग केवल एक ‘फाइल’ को दबाने के लिए कर रही है।
मधु किश्वर और दमन: जैसा कि किश्वर जी ने कहा, राज्य की मशीनरी का उपयोग अब सच बोलने वालों को कुचलने के लिए किया जा रहा है, जबकि असली सवाल (जैसे डिग्री) फाइलों के ढेर में दफन कर दिए जाते हैं।
‘डिग्री’ नहीं, यह ‘भरोसे’ की हार है-अगर डिग्री असली है, तो उसे दिखाने में 10 साल क्यों लगे? और अगर फाइल नहीं मिल रही, तो यह प्रशासनिक अक्षमता का चरम है।
यह “डिग्री का दंगल” दरअसल उस ‘सत्ता के ब्लूप्रिंट’ का हिस्सा है जहाँ पारदर्शिता को ‘खतरा’ माना जाता है और गोपनीयता को ‘गवर्नेंस’।
जब चुनाव ऑब्जर्वर होटल के कमरों में गुप्त बैठकें कर रहे हों, तो हमें यह मान लेना चाहिए कि इस तंत्र में कुछ भी ‘साफ-सुथरा’ दिखाने की मंशा ही नहीं बची है।
क्या एक डिग्री के लिए देश के सर्वोच्च विधिक अधिकारियों का अदालत में गिड़गिड़ाना हमारे लोकतंत्र की सबसे बड़ी विडंबना नहीं है?
(DISCLAIMER: यह लेखक के अपने विचार हैं गोरखपुर हलचल का इससे कोई सरोकार नहीं है)


