भारत में तानाशाही पूर्ण लोकतंत्र (आलेख: पी.सी. नियोगी अंग्रेजी से अनुवाद-संजय पराते) PART-2

भारत में ‘कानून के शासन’ का अधिकार तेज़ी से कार्यपालिका (सरकार) के हाथों में सिमटता जा रहा है, क्योंकि केंद्र सरकार जान-बूझकर केंद्रीकरण की नीति अपना रही है।

यह बदलाव तानाशाही शासन की ओर एक निर्णायक कदम है। विपक्षी दलों, नागरिक समाज और मीडिया को या तो भारतीय जनता पार्टी के तानाशाहीपूर्ण तौर-तरीकों को मानने के लिए मजबूर किया जाता है, या फिर उन पर दंडात्मक कार्रवाई की जाती है।

ऐसी कार्रवाई अक्सर प्रवर्तन निदेशालय (ईडी), केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई), आयकर विभाग, पुलिस और अर्ध-सैनिक बलों जैसी एजेंसियों के ज़रिए की जाती है।

सत्ताधारी पार्टी मीडिया, संस्थानों और राज्य के संसाधनों पर अपना नियंत्रण मज़बूत करके अपना दबदबा बनाए रखती है।

धर्म-आधारित लोकतंत्र ने इसके उभार में मदद की है, जिसमें सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के लिए नागरिकों के बीच कट्टरपंथी सिद्धांतों को बहुत बारीकी से लागू किया जाता है।

आरएसएस और भाजपा की राजनीति ने समाज में गहरे विभाजन पैदा किए हैं, जिससे उन्हें राजनीतिक वर्चस्व हासिल करने में मदद मिली है। चुनावी मशीनरी को अपने मज़बूत प्रभाव में रखकर चुनावी जीत भी सुनिश्चित की जाती है।

धार्मिक कट्टरता तानाशाही शासन को बनाए रखने का एक पैना हथियार बन गया है। आरएसएस की मुख्य विचारधारा, यानी मनुवादी विचारधारा, देश के सामाजिक-राजनीतिक ढांचे को बदलने के लिए एक मार्गदर्शक नज़रिया प्रदान करती है।

सांप्रदायिक ध्रुवीकरण अब किसी एक धर्म तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि कई समुदायों में फैल गया है, जिससे भारत की धर्मनिरपेक्ष भावना के लिए गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

साथ ही, नैतिक शिक्षा का कमज़ोर होना — जो कभी नागरिक जीवन का आधार हुआ करती थी — एक चिंताजनक गिरावट का संकेत है।

स्थापित मानदंडों से इस गिरावट के पीछे कुछ खास लोगों के हित रहे हैं, जिससे देश की व्यापक नैतिक नींव कमज़ोर हुई है।

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