लखनऊ: उत्तर प्रदेश में बिजली विभाग के लगभग 25 हजार संविदा कर्मियों को हटाए जाने का मामला एक बार फिर गरमा गया है।
विद्युत कर्मचारी संयुक्त संघर्ष समिति ने ऊर्जा मंत्री अरविंद कुमार शर्मा के उस निर्देश का स्वागत किया है जिसमें बिना कारण किसी भी संविदाकर्मी को सेवा से न हटाने की बात कही गई है।
साथ ही समिति ने मांग किया है कि पिछले ढाई वर्षों में हटाए गए सभी संविदा कर्मियों को तत्काल बहाल किया जाए। समिति के पदाधिकारियों का आरोप है कि
“निजीकरण की तैयारी और “मैनपावर रेशनलाइजेशन” के नाम पर बड़े पैमाने पर संविदा कर्मियों की छंटनी की गई। समिति के अनुसार वर्ष 2017 में जारी मानकों के तहत
शहरी उपकेंद्रों पर 36 और ग्रामीण उपकेंद्रों पर 20 संविदा कर्मियों की व्यवस्था निर्धारित थी, लेकिन नए टेंडरों में इस संख्या को काफी कम कर दिया गया।
अक्टूबर 2024 से संविदा कर्मियों को हटाने का अभियान शुरू हुआ और इसके चलते प्रदेशभर में लगभग 25 हजार से अधिक कर्मचारी बेरोजगार हो गए।
इनमें कई ऐसे अनुभवी कर्मचारी भी शामिल हैं जिन्होंने 20 से 25 वर्षों तक बिजली व्यवस्था को संभालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
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घर्ष समिति ने 55 वर्ष की आयु में संविदा कर्मियों को अनिवार्य रूप से हटाने की नीति पर भी सवाल उठाया है। समिति का कहना है कि जब निगमों के शीर्ष अधिकारियों की सेवानिवृत्ति आयु 62 वर्ष है, तो संविदा कर्मियों के लिए 55 वर्ष की सीमा अन्यायपूर्ण है।
समिति ने चेतावनी दी है कि अनुभवी कर्मियों की कमी के कारण बिजली फॉल्टों को ठीक करने में अधिक समय लग रहा है, जिससे उपभोक्ताओं को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है और शेष कर्मचारियों पर कार्यभार बढ़ गया है।
हमारी मांग की है कि 2017 के मानकों के अनुरूप संविदा कर्मियों की संख्या बहाल की जाए तथा हटाए गए सभी कर्मियों को तत्काल सेवा में वापस लिया जाए ताकि प्रदेश की बिजली व्यवस्था को और मजबूत बनाया जा सके।


