भारत के इतिहास में कुछ ऐसे महापुरुष हुए हैं, जिनका योगदान देश की एकता, अखंडता और राष्ट्रीय पहचान की मजबूत नींव बना। सरदार वल्लभभाई पटेल उन्हीं महान विभूतियों में से एक हैं।
आज 31 अक्टूबर को पूरा देश उनकी जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस (National Unity Day) के रूप में मना रहा है। देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री सरदार पटेल को उनकी दृढ़ इच्छाशक्ति, दूरदर्शिता और राष्ट्र के प्रति समर्पण के लिए हमेशा याद किया जाता है।
‘लौह पुरुष’ के नाम से विख्यात सरदार पटेल ने आजादी के बाद बिखरी हुई रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराने में ऐतिहासिक भूमिका निभाई। उनका यह योगदान भारत की एकता और अखंडता के इतिहास में स्वर्ण अक्षरों में दर्ज है।
सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म 31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नडियाद में हुआ था। पेशे से वकील रहे पटेल महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हुए।
खेड़ा सत्याग्रह (1918) और बारडोली सत्याग्रह (1928) में उनके नेतृत्व ने उन्हें राष्ट्रीय स्तर पर पहचान दिलाई। बारडोली आंदोलन की सफलता के बाद उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि मिली।
15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ तो भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक सैकड़ों देशी रियासतों का एकीकरण था।
उस समय सरदार पटेल ने कूटनीति, संवाद, दूरदर्शिता और दृढ़ इच्छाशक्ति के जरिए 560 से अधिक रियासतों को भारतीय संघ में शामिल कराने में निर्णायक भूमिका निभाई।
देश के पहले उप प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के रूप में उन्होंने न केवल राजनीतिक एकीकरण को मजबूती दी, बल्कि प्रशासनिक व्यवस्था को भी सुदृढ़ बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
क्यों मनाया जाता है राष्ट्रीय एकता दिवस?
भारत सरकार ने वर्ष 2014 से सरदार वल्लभभाई पटेल की जयंती को राष्ट्रीय एकता दिवस के रूप में मनाने की शुरुआत की। इस दिन देशभर में विभिन्न सरकारी संस्थानों, स्कूलों,
कॉलेजों और सामाजिक संगठनों की ओर से एकता की शपथ, जागरूकता कार्यक्रम और ‘रन फॉर यूनिटी’ जैसे आयोजन किए जाते हैं। इस दिवस का उद्देश्य देश की एकता, अखंडता, सुरक्षा और सामाजिक सद्भाव के प्रति नागरिकों को जागरूक करना है।
गुजरात में स्थित सरदार पटेल की प्रतिमा ‘स्टैच्यू ऑफ यूनिटी’ उनकी महान विरासत और राष्ट्र निर्माण में योगदान का प्रतीक है। यह दुनिया की सबसे ऊंची प्रतिमा है और देश-विदेश के लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र है।

