विशेष व्यंग्य | महेंद्र गौड़ ‘गंवार’ की कलम से
धार्मिक आयोजनों में आधुनिकता के नाम पर बदलते स्वरूप को लेकर महेंद्र गौड़ ‘गंवार’ ने अपने व्यंग्यात्मक लेख के जरिए आयोजकों और प्रायोजकों पर तीखा कटाक्ष किया है।
उन्होंने रामलीला में कथित रूप से बढ़ते प्रेम-प्रसंगों और गरबा-डांडिया में भक्ति की जगह दिखावे को प्राथमिकता दिए जाने पर सवाल उठाए हैं।
लेख में कहा गया है कि एक समय रामलीला में मर्यादा, आदर्श और भगवान श्रीराम के चरित्र का मंचन प्रमुख होता था, जबकि गरबा-डांडिया मां दुर्गा की आराधना और भक्ति का प्रतीक माना जाता था।
लोग इन आयोजनों में मनोरंजन के साथ धार्मिक आस्था और सांस्कृतिक परंपराओं से जुड़ने के लिए पहुंचते थे।
लेकिन बदलते दौर में कुछ आयोजनों के स्वरूप पर सवाल उठने लगे हैं।
व्यंग्यकार का कहना है कि आधुनिकता और लोकप्रियता की दौड़ में कहीं-कहीं धार्मिक आयोजनों की मूल भावना पीछे छूटती नजर आती है। रामलीला में ऐसे प्रसंगों को मंचित करने पर आपत्ति जताई गई है,
जो रामायण की मर्यादा और मूल कथा से मेल नहीं खाते। वहीं, गरबा-डांडिया में भी भक्ति के बजाय प्रदर्शन और कथित फूहड़ता को लेकर चिंता व्यक्त की गई है।
‘धर्म कोई रील नहीं, रामलीला कॉमेडी शो नहीं’
महेंद्र गौड़ ‘गंवार’ ने अपने चुटीले अंदाज में लिखा है कि रामलीला कोई कॉमेडी शो नहीं और गरबा धार्मिक आस्था के नाम पर मनमानी प्रस्तुतियों का लाइसेंस भी नहीं है।
उनका तर्क है कि परंपराओं में समय के साथ बदलाव होना स्वाभाविक है, लेकिन बदलाव के नाम पर उनकी मूल भावना और सांस्कृतिक पहचान को ही भुला देना उचित नहीं है।

