विशेष आलेख | बादल सरोज
भोपाल/सीहोर। मध्य प्रदेश के सीहोर जिले के बुदनी क्षेत्र के कोसमी गांव में आदिवासी परिवारों के मकान तोड़े जाने और फसलों को नुकसान पहुंचाने की घटना ने राजनीतिक बहस को जन्म दिया है।
केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने घटना पर नाराजगी जताते हुए वन विभाग के अधिकारियों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया और पीड़ित आदिवासी परिवारों के समर्थन में धरना दिया।
हालांकि, लेखक बादल सरोज ने अपने आलेख ‘शिवराजी आँसू’ में इस घटनाक्रम को लेकर कई सवाल उठाए हैं। उनका तर्क है कि आदिवासियों के प्रति संवेदना केवल चुनिंदा घटनाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए।
आलेख के मुताबिक, कोसमी गांव में वन विभाग के अमले ने करीब 12 आदिवासी परिवारों के मकान तोड़ दिए। आरोप है कि उनकी मक्का और अरहर की खड़ी फसलों को भी नष्ट किया गया तथा कुओं को मिट्टी से पाट दिया गया।
प्रभावित परिवारों का दावा है कि वे वर्ष 2004 से संबंधित भूमि पर रह रहे थे और वनाधिकार कानून के तहत उनके अधिकारों पर विचार किया जाना चाहिए।
दूसरी ओर, आलेख में वन अधिकारियों के हवाले से कार्रवाई को कथित अवैध अतिक्रमण हटाने की प्रक्रिया बताया गया है। इस मामले में प्रभावित परिवारों के भूमि संबंधी दस्तावेजों, वनाधिकार दावों और प्रशासनिक कार्रवाई की वैधानिकता की स्वतंत्र पुष्टि आवश्यक है।
सरोज अपने आलेख में शिवराज सिंह चौहान की भूमिका पर सवाल उठाते हुए लिखते हैं कि यदि कोसमी में आदिवासी परिवारों के साथ हुई कार्रवाई गलत है, तो प्रदेश के दूसरे जिलों में आदिवासियों की बेदखली से जुड़े मामलों पर भी इसी तरह आवाज उठनी चाहिए।
लेखक सीधी, सिंगरौली, देवास, बुरहानपुर, बड़वानी, पन्ना और छतरपुर सहित विभिन्न क्षेत्रों में आदिवासियों की जमीन और विस्थापन से जुड़े मुद्दों का उल्लेख करते हैं।
उनका सवाल है कि क्या आदिवासियों के अधिकारों की रक्षा राजनीतिक समर्थन और चुनावी समीकरणों से ऊपर नहीं होनी चाहिए?
बालाघाट के बैगा आदिवासी बच्चों की मौतों, सागर के कथित जहरीली शराब कांड और केन-बेतवा परियोजना से जुड़े विस्थापन के मुद्दों का भी जिक्र किया है।
उनका कहना है कि आदिवासी समुदायों के स्वास्थ्य, पोषण, जमीन और पुनर्वास से जुड़े सवालों पर भी समान गंभीरता से ध्यान दिया जाना चाहिए।
आलेख में वर्ष 2017 के मंदसौर किसान गोलीकांड का उल्लेख करते हुए लेखक ने शिवराज सिंह चौहान की तत्कालीन राजनीतिक भूमिका पर भी सवाल उठाए हैं।
उनका तर्क है कि किसी घटना पर सार्वजनिक रूप से दुख जताना पर्याप्त नहीं, बल्कि सरकार की नीतियों और प्रशासनिक कार्रवाई की जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
कोसमी की घटना ने एक बार फिर आदिवासी भूमि अधिकारों, वनाधिकार कानून के क्रियान्वयन, विस्थापन और प्रशासनिक जवाबदेही जैसे मुद्दों को चर्चा में ला दिया है।
इन सवालों का जवाब राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप से आगे बढ़कर निष्पक्ष जांच, कानूनी प्रक्रिया और प्रभावित परिवारों को न्याय सुनिश्चित करने से ही मिल सकता है।
(डिस्क्लेमर: यह लेखक के निजी विचार हैं। गोरखपुर हलचल का इन विचारों से कोई सरोकार नहीं है। आलेख में व्यक्त विचारों और आरोपों से संपादकीय सहमति आवश्यक नहीं है।)

