(गुस्ताख़ी माफ़) ‘गंवार’ महेंद्र गौड़ की कलम से…
लखनऊ। उत्तर प्रदेश में सत्ता तक पहुंचने का सपना देख रही कांग्रेस को पहले अपने घर की कलह से ही दो-चार होना पड़ रहा है। लखनऊ स्थित प्रदेश कांग्रेस कार्यालय में नए पदाधिकारियों के पदभार ग्रहण के दौरान
ऐसा बवाल मचा कि संगठन की मजबूती के दावे पीछे छूट गए और जूते-चप्पलों की चर्चा सुर्खियों में आ गई। नारेबाजी से शुरू हुआ विवाद कथित तौर पर गाली-गलौज, धक्का-मुक्की और मारपीट तक जा पहुंचा।
सपा के बाद कांग्रेस में भी जूते-चप्पलों की सियासत!
राजनीति में विरोधियों से मुकाबला करने के लिए रणनीति बनाई जाती है, लेकिन जब पार्टी के अपने ही आमने-सामने आ जाएं तो विरोधियों को बैठे-बिठाए मुद्दा मिल जाता है।
सपा के बाद कांग्रेस के भीतर भी कथित मारपीट और जूते-चप्पल चलने की घटना ने राजनीतिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। फर्क बस इतना है कि सियासी एकजुटता के दावों के बीच यहां आपसी नाराजगी खुलकर सामने आ गई।
संगठन मजबूत करने की कवायद, लेकिन कार्यकर्ता ही आमने-सामने!
कांग्रेस उत्तर प्रदेश में अपनी राजनीतिक जमीन मजबूत करने की तैयारी में जुटी है। आराधना मिश्रा ‘मोना’ और इमरान मसूद समेत पार्टी के नेता संगठन को मजबूत करने और गठबंधन की एकजुटता का संदेश देने में लगे हैं।
मगर सवाल यह है कि जिस पार्टी के दफ्तर में ही आपसी तालमेल की परीक्षा होने लगे, वह जनता के बीच एकजुटता का भरोसा कैसे कायम करेगी?
‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ का नारा, अब सियासी अखाड़े में भी जोर-आजमाइश!
कांग्रेस का चर्चित नारा ‘लड़की हूं, लड़ सकती हूं’ कभी राजनीतिक संदेश के रूप में उभरा था। मगर लखनऊ की घटना ने पार्टी की अंदरूनी खींचतान को लेकर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
यहां लड़ाई विचारों, नीतियों और जनहित के मुद्दों पर होनी चाहिए थी, लेकिन विवाद ने ऐसा रूप लिया कि चर्चा संगठन की विचारधारा से हटकर कथित मारपीट पर केंद्रित हो गई।
नई शुरुआत से पहले ही पुराने हिसाब-किताब!
नवरात्र के पहले दिन नई प्रदेश अध्यक्ष ने पदभार संभाला तो उम्मीद थी कि पार्टी में नई ऊर्जा और नए उत्साह का संचार होगा। संगठन को नई दिशा मिलेगी और कार्यकर्ताओं में एकजुटता का संदेश जाएगा।
लेकिन अजय राय के समर्थकों की नारेबाजी, दूसरे पक्ष की नाराजगी और उसके बाद हुए हंगामे ने पार्टी के भीतर चल रही खींचतान को सार्वजनिक बहस का विषय बना दिया।
नई जिम्मेदारी के साथ नई शुरुआत की उम्मीदें थीं, मगर शुरुआत में ही विवादों ने सुर्खियां बटोर लीं। सवाल उठना लाजिमी है कि जब संगठन के भीतर ही
असंतोष को संभालना चुनौती बन जाए, तो प्रदेश की जनता के सामने एक मजबूत राजनीतिक विकल्प बनने का दावा कितना असरदार होगा?
दिल्ली में संघर्ष, लखनऊ में अंदरूनी संग्राम!
पार्टी के केंद्रीय नेता जहां अपने राजनीतिक संघर्ष में जुटे हैं, वहीं प्रदेश संगठन के भीतर इस तरह के विवाद कांग्रेस की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं।
चुनाव जीतने के लिए केवल बड़े-बड़े दावे, गठबंधन की तस्वीरें और मंचों से दिए गए भाषण काफी नहीं होते। इसके लिए जरूरी है अनुशासन, आपसी विश्वास और कार्यकर्ताओं के बीच समन्वय।
उत्तर प्रदेश में कांग्रेस को अगर अपनी खोई राजनीतिक जमीन वापस हासिल करनी है, तो उसे सबसे पहले अपने संगठन की कमजोरियों पर ध्यान देना होगा।
आपसी मतभेद लोकतांत्रिक राजनीति का हिस्सा हैं, लेकिन जब वे सार्वजनिक हंगामे में बदल जाएं तो नुकसान पार्टी की छवि को ही होता है।
आखिर में बस इतनी-सी बात…
यूपी फतह का सपना देखने वाली कांग्रेस को पहले अपने दफ्तर में शांति और अपने कार्यकर्ताओं में अनुशासन कायम करना होगा। विरोधियों को घेरने से पहले अपनों के बीच की दूरी कम करनी होगी।
क्योंकि राजनीति में जूते-चप्पलों से सुर्खियां जरूर मिल सकती हैं, लेकिन जनता का भरोसा और वोट हासिल करने के लिए काम, विचार और संगठन की मजबूती चाहिए।
याद रखिए—सियासत में जीत का रास्ता जूतों से नहीं, जनता के जज़्बातों से होकर गुजरता है।

