थैंक यू मोदी जी, सोनम वांगचुक की जान बचाने के लिए। वर्ना कॉकरोचों ने तो बेचारे लद्दाखी की जान ही ले ली थी। एक दिन नहीं, दो दिन नहीं, पूरे बीस दिन बेचारे पहाड़ी को भूखा रखा।
वह भी दिल्ली की भयंकर गर्मी में। वह भी जंतर-मंतर पर खुले आसमान के नीचे। ऊपर से जब-तब बारिश और साथ में कई छात्रों को और भूख हड़ताल पर बैठा दिया यानी बंदा उठना भी चाहे, तो भी शर्मी-सौदा बैठा रहे।
बच्चे भूख हड़ताल पर बैठे रहें और बुजुर्ग भूख की मार से उठ जाए, तो लोग क्या कहेंगे? इसी चक्कर में बेचारे की जान पर ही बन आयी थी।
वैसे आपने धीरज भी खूब दिखाया। दिल्ली में ऐन अपने सेवा तीर्थ की नाक के नीचे, कॉकरोचों को चार-चार हफ्ते जमा रहने दिया, जिंदाबाद-मुर्दाबाद करने दिया, धर्मेंद्र बाबू का इस्तीफा मांगते रहने दिया।
और भी न जाने क्या-क्या मांगते रहने दिया। तीन-तीन हफ्ते तक भूखे रहने दिया। 145 करोड़ के चुने हुए पीएम ने पूरे बीस दिन तक इंतजार किया!
वह तो जब वांगचुक के भूखे रहने का इक्कीसवां दिन लग गया, तो आप जी ने झट पहचान लिया कि अभी नहीं, तो कभी नहीं। फिर क्या था, छेड़ दिया ‘‘ऑपरेशन प्राण रक्षा।’’
शाह जी की पुलिस ने भी झटपट कार्रवाई की। मोदी सरकार की पुलिस है, कोई पिछले जैसी लटकाने, अटकाने, भटकाने वाली, सरकारों वाली पुलिस थोड़े ही है, जो देर लगाती।
सुबह तडक़े ही जंतर-मंतर पर धावा बोल दिया, कैमरों को रोकने के लिए टेंपरेरी पर्दा खड़ा किया, कॉकरोचों को धकिया के दूर भगाया, वांगचुक को डंगाडोली कर के उठाया, एंबुलेंस में डाला और सीधे अस्पताल पहुंचा दिया।
इसके बाद, भूख हड़ताल करने वालों की जान बचाने के लिए क्या करना होता है, यह भारत के पुलिस वाले बखूबी जानते हैं। अंगरेजों के जमाने में उनके पुरखों ने बार-बार ऐसे ही प्राण रक्षा करने का काम किया जो था।
उनकी आदत का असर पुलिस की अब की पीढिय़ों के खून में है और कुछ हो न हो, वांगचुक की जान अब कॉकरोचों की वजह से भूखे रहने से नहीं जाएगी।
वैसे एक बात तो माननी पड़ेगी कि मोदी जी सोनम वांगचुक की जान की कुछ ज्यादा ही परवाह करते हैं। अभी पिछले साल ही तो लद्दाख वाले झंझट के टैम पर भी वांगचुक की जान बचायी थी।
अगले को एनएसए में गिरफ्तार करना पड़ा तो किया, उदयपुर की जेल में बंद रखना पड़ा तो रखा, पर अगले की जान बचाकर माने।
सात-आठ महीने बाद, जब खतरा टल गया, तो अगले को बिना कोई आरोप लगाए जेल से बाहर भी कर दिया। हमें तो लगता है कि आप जी के इस तरह बार-बार जान बचाने ने ही सोनम वांगचुक को सिर चढ़ा दिया है।
बंदा बार-बार अपनी जान जोखिम में डाल देता है कि आप जी तो बचा ही लोगे। ये फुनसुक वांगडू आप की ममता का बेजा फायदा उठा रहा है जी और आप जी हैं कि उसे बेजा फायदा उठाने दे रहे हैं।
फिर आप जी अगर ऑपरेशन प्राण रक्षा चला ही रहे थे, तो वांगचुक की ही तरह, बगल में ही भूख हड़ताल पर बैठे छात्रों को भी उठवा लेते, उनकी भी प्राण रक्षा करा देते।
कम से कम विरोधियों को यह प्रचार करने का मौका नहीं मिलता कि मोदी को छात्रों की परवाह नहीं है-बच्चों को ही मरने को छोड़ दिया।
अब शाह की जी पुलिस इतनी कमजोर तो नहीं ही हो सकती कि जंतर-मंतर से वांगचुक के साथ तीन-चार भूख हड़ताली छात्रों को भी नहीं उठा पाती।
वैसे इतना तो हम भी समझते हैं कि ये छात्र वगैरह हैं तो इसी तरह के सलूक के काबिल। चार किताबें क्या पढ़ गए, हर बात पर बहस करना चाहते हैं, हर चीज पर सवाल और वह भी आप जी से।
अब इन्हें कौन समझाए कि आप जी ने सवाल करना तो उन मीडिया वालों का भी छुड़वा दिया, जिन्हें तनख्वाह ही सवाल करने की मिलती थी, फिर ये बच्चे किस खेत की मूली हैं, मगर ये नहीं समझते।
पढ़ाई रुकवा दो, फिर भी नहीं समझते। जेल में डाल दो, फिर भी नहीं समझते। आप जी के मास्टर स्ट्रोक तक को मास्टर स्ट्रोक नहीं समझते हैं, उल्टे विरोध करने के लिए खड़े हो जाते हैं-वामी कहीं के!
अब आप इनकी सुनने लगें, तब तो हो चुकी इस महान देश की प्राचीन सांस्कृतिक परंपरा की वापसी। इन्हें बाबरी मस्जिद तो अब भी याद है, पर संत कबीरदास जी की उतनी ही पुरानी शिक्षा बिल्कुल ही भूल गए हैं।
आप जी की सरकार कबीरदास जी की शिक्षा पर चल रही है, तो ये उसका भी विरोध कर रहे हैं। कबीरदास जी ने तो मुगलों के टैम में कह दिया था-‘‘पोथी पढ़ि-पढ़ि जग मुआ, भया न पंडित कोइ’’।


