आखिर ये कौन लोग हैं, जो मंदिर में चंदा चोरी, चंदा चोरी का इतना शोर मचा रहे हैं। किसी ऐसे-वैसे मंदिर में नहीं, अयोध्या के रामलला के मंदिर में चंदा चोरी का शोर मचा रहे हैं।
रामलला के उसी मंदिर में चंदा चोरी का शोर मचा रहे हैं, जो ठीक उसी जगह बनाया गया है, जहां सैकड़ों साल तक एक मस्जिद खड़ी रही थी — बाबरी मस्जिद।
वैसे मस्जिद नाम की ही बाबरी थी, वर्ना थी तो छोटी-सी ही मस्जिद। जबकि मोदी जी ने मंदिर भव्य बनवाया है ; इतनी लंबी-चौड़ी जमीन में कि उसमें मस्जिद की जमीन नहीं भी जुड़ती, तब भी भव्यता की कोई कमी नहीं पड़ती।
पर मस्जिद से जमीन खाली करा के उसे घेर कर मंदिर बनाने से मंदिर की भव्यता में जो चार चांद और लगे हैं, वो कहां लग पाते!
और मंदिर वाले एक्स्ट्रा चार चांद चाहे लोग उतने मिस नहीं भी करते, पर मोदी जी की दिव्यता में जो चार चांद लगे हैं, उनके बिना मोदी जी कैसे रह पाते।
मोदी जी ने चुने हुए प्रधानमंत्री के रूप में अपने राज की लंबाई के मामले में नेहरू जी को तो अब हराया है, पर बाबर को तो उन्होंने बहुत पहले ही हरा दिया था।
कहां बाबर की छोटी-सी, मामूली-सी मस्जिद और वह भी गैर-कानूनी और कहां मोदी जी वाला भव्य मंदिर!हमें मालूम है कि मोदी जी वाला मंदिर कहते ही,
भाई लोग इसका मुकद्दमा लेकर बैठ जाएंगे कि मंदिर तो रामलला का है, मोदी जी वाला मंदिर कैसे कह सकते हैं? मंदिर अगर रामलला का है, तो मस्जिद में कौन-सी बाबर के नाम की नमाज पढ़ी जाती थी।
फिर भी मस्जिद जब तक गिरायी नहीं गयी, कहलाती तो बाबरी मस्जिद ही थी। जब मस्जिद का नाम बादशाह के नाम पर हो सकता है, तो मंदिर का नाम पीएम के नाम पर क्यों नहीं हो सकता है?
मुसलमान बादशाह, बादशाह और हिंदू मोदी-शाह क्या… दरबारी! खैर, मंदिर भले ही रामलला का ही कहलाए, इससे तो कोई इंकार नहीं कर सकता है कि मंदिर बनवाया तो मोदी जी ने ही है।
मस्जिद वाली जमीन दी चाहे अदालत ने, पर उससे दिलायी तो मोदी जी ने ही। मंदिर बनवाने के लिए ट्रस्ट बनाया मोदी जी ने।
शिला पूजन से लेकर, अधूरे मंदिर में प्राण प्रतिष्ठा से लेकर, करीब-करीब पूरे मंदिर में ध्वजारोहण तक, हरेक जिम्मा उठाया मोदी जी ने। और तो और रामलला को उंगली पकडक़र उनके घर वापस लेकर आए मोदी जी। फिर भी मोदी मंदिर कहने में हिचक — यहीं तो हिंदू मात खा गए।
खैर! चंदा चोरी पर लौटें। सबसे पहली बात तो यह कि क्या किसी मंदिर के सिलसिले में, ‘‘चंदा चोरी’’ की संज्ञा का प्रयोग किया जा सकता है?
बेशक, चोरी शब्द के प्रयोग की भी अपनी समस्याएं हैं, पर ‘‘चंदा’’ शब्द का उपयोग तो एकदम ही अनुपयुक्त है। चंदा शब्द का प्रयोग वास्तव में धर्म के मामलों में राजनीति की भोंडी घुसपैठ का सबूत है।
चंदा वह होता है, जो राजनीतिक पार्टियां जमा करती हैं और पब्लिक, राजनीतिक पार्टियों को देती है। वैसे मोदी जी की पार्टी ने जब से चुनावी बांड का सिस्टम चालू किया था, तब से पुराने टाइप का पब्लिक वाला चंदा तो करीब-करीब आउट आफ फैशन ही हो चुका है।
बाद में चुनावी बांड का सिस्टम तो नहीं रहा, पर पुराना फैशन भी लौटकर नहीं आया। हां, उगाही के नये-नये सिस्टम जरूर निकाल आये। आवश्यकता को आविष्कार की जननी यूं ही थोड़े ही कहा गया है।
खैर! मंदिर के चढ़ावे में जो दिव्यता होती है, चंदे की पार्थिवता से उसकी क्या तुलना? वैसे भी चंदा देने वाला, सिर्फ देता नहीं है, बदले में कुछ चाहता भी है।
जितना बड़ा चंदा, उतनी ही बड़ी मांग। चोरी हो या डकैती, मंदिर के चढ़ावे को मोदी जी के विरोध के चक्कर में ऐसे लेन-देन के साथ एक ही पलड़े पर तोलना तो भक्त और भगवान, दोनों का अपमान है।
रही बात चोरी की, तो जैसी खबरें आ रही हैं, उन्हें देखते हुए लगता नहीं है कि इसे चोरी का मामला कहा जा सकता है। पहले खबर आई कि 6-7 करोड़ रुपये का घपला हुआ।
फिर खबर आई कि भाई लोगों ने रामलला के चढ़ावे में से 12-13 करोड़ रुपये उड़ा लिए। फिर खबर आयी कि मामला 200 करोड़ रुपये तक जा सकता है।
फिर 4,000 करोड़ रुपये का आंकड़ा आ गया। यानी चोरी बढ़ती ही गयी, ज्यों-ज्यों रौशनी डाली खबर देने वालों ने। गोबर में नोटों की गड्डियां मिलने लगीं।
साइकिल पर चलने वालों की बड़ी-बड़ी एसयूवियां दौड़ने लगीं। कच्चे-पक्के घरों में रहने वालों की कोठियां खड़ी होने लगीं, हॉस्टल चलने लगे।
फिर पता चला कि मंदिर बनने से पहले, मंदिर के लिए जमीनों की खरीद में करोड़ों के वारे-न्यारे हुए थे। फिर खबर आई कि मंदिर की पहली ईंट रखे जाने से पहले से, मंदिर के नाम पर चंदे में सैकड़ों करोड़ के वारे न्यारे हुए।
फिर बताया जाने लगा कि ‘मंदिर वहीं बनाएंगे’ के नारे के जमाने से चंदे की लूट चल रही थी। इस सब को चोरी कहना, क्या इतने अलग-अलग प्रयोग करने वालों के उद्यम का निरादर ही नहीं होगा।
वैसे भी मंदिर की भव्यता के साथ, चोरी की बात मैच नहीं करती है। डकैती नहीं भी सही, कम से कम लूट तो इसे कहना ही चाहिए। आखिरकार, मोदी जी और रामलला, दोनों की प्रतिष्ठा का सवाल है!
(to be continued…)


