भारत में तानाशाही पूर्ण लोकतंत्र (आलेख: पी.सी. नियोगी अंग्रेजी से अनुवाद-संजय पराते) PART-1

ब्रिटिश राज एक तानाशाह शासन के रूप में काम करता था, जिसका मुख्य मकसद संसाधनों का दोहन और कानून-व्यवस्था बनाए रखना था।

आज़ादी के बाद, भारत को विरासत में औपनिवेशिक दौर की नौकरशाही और पुलिस का ढांचा मिला, और इसने नागरिक आज़ादी के बजाय राज्य की सुरक्षा को प्राथमिकता देना जारी रखा।

असहमति को दबाने के लिए बनाए गए कानूनी प्रावधान — जैसे राजद्रोह कानून, निवारक नज़रबंदी और आपातकाल की व्यापक शक्तियां —आज़ाद भारतीय राज्य के ढांचे में आसानी से शामिल कर लिए गए और शासन के दमनकारी औज़ारों के तौर पर बने रहे।

भारत की लोकतांत्रिक प्रणाली में तानाशाही वाली प्रवृत्ति सबसे ज़्यादा तब दिखी, जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल (1975-77) लागू किया।

इस दौरान नागरिकों की आज़ादी छीन ली गई, प्रेस की आज़ादी पर रोक लगा दी गई और कानून के शासन को कार्यपालिका के मातहत कर दिया गया।

25 जून, 1975 को लागू और 21 मार्च 1977 को हटाया गया आपातकाल विपक्षी पार्टियों के लिए एक बड़ा झटका था, जिन्होंने इसे लागू किए जाने का कड़ा विरोध किया था।

आखिरकार, विपक्षी पार्टियों के नेतृत्व में चले जन-आंदोलन ने लोगों के विरोध को लामबंद किया और लोकतांत्रिक शासन व्यवस्था को बहाल किया।

राजनीतिक विश्लेषक आम तौर पर इस घटना को संवैधानिक लोकतंत्र से एक अस्थायी, लेकिन गंभीर भटकाव मानते हैं, जिसे अक्सर भारत के इतिहास में एक काले दौर के तौर पर याद किया जाता है।

2014 के बाद से, कई विद्वानों और विश्लेषकों ने भारत के राजनैतिक सफर को लोकतांत्रिक व्यवस्था के निलंबन के पिछले दौर से बिल्कुल अलग माना है।

इसे सिर्फ़ कुछ समय के लिए रास्ते से हटना नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक नियम-कायदों के लगातार कमज़ोर होने के दौर के तौर पर देखा जाता है।

देश को अक्सर ‘चुनावी तानाशाही’ के रूप में वर्णित किया जाता है — एक ऐसी व्यवस्था, जहाँ लोकतंत्र की संस्थाएँ तो औपचारिक रूप से बनी रहती हैं,

लेकिन सत्ता के केंद्रीकरण, असहमति को दबाने और बहुसंख्यकवादी राजनीति के दबदबे जैसी चीज़ों से वे धीरे-धीरे कमज़ोर होती जाती हैं।

कई राजनीतिक विचारकों का तर्क है कि 2014 के बाद के दौर में ये रुझान और तेज़ हुए हैं, जिससे भारत की धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक नींव के धीरे-धीरे कमज़ोर होने को लेकर गंभीर चिंताएँ पैदा हुई हैं।

(आगे भी जारी….)

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