गोरखपुर: दीनदयाल उपाध्याय गोरखपुर विश्वविद्यालय के पूर्व प्रवक्ता एवं पुरातत्वविद् डॉ. संपूर्णानंद मल्ल ने एक बार फिर अपनी बर्खास्तगी को लेकर बड़ा आरोप लगाया है।
उन्होंने राज्यपाल, मुख्यमंत्री, उच्च शिक्षा मंत्री, मुख्य सचिव, प्रमुख सचिव उच्च शिक्षा तथा इलाहाबाद हाईकोर्ट के मुख्य न्यायाधीश को संबोधित ज्ञापन भेजकर वर्ष 2009 में जारी कथित “कूटरचित एवं फर्जी पत्र” को निरस्त करने और मामले की CBI जांच कराने की मांग की है।
डॉ. मल्ल का आरोप है कि विश्वविद्यालय ने उन्हें सेवा से हटाने के लिए ऐसा शासनादेश दर्शाया, जिसमें प्रवक्ता पद के लिए स्नातक में न्यूनतम 50 प्रतिशत अंक अनिवार्य बताए गए।
उनका कहना है कि भारत में एमए में प्रवेश के लिए स्नातक में 50 प्रतिशत अंक की ऐसी कोई सार्वभौमिक अनिवार्यता नहीं रही और विश्वविद्यालय स्तर पर
प्रवक्ता पद के लिए यूजीसी की निर्धारित योग्यता स्नातकोत्तर में न्यूनतम 55 प्रतिशत अंक तथा यूजीसी नेट है, जिसे उन्होंने पूरा किया था।
उन्होंने दावा किया कि उनकी नियुक्ति वर्ष 2003 में यूजीसी रेगुलेशन के तहत हुई थी तथा लगभग पांच वर्षों तक उन्होंने शिक्षण, परीक्षा, मूल्यांकन एवं अन्य शैक्षणिक कार्य किए। इसके बाद कथित फर्जी आधार पर उनकी सेवा समाप्त कर दी गई।
डॉ. मल्ल ने स्वयं को यूजीसी नेट, जेआरएफ तथा दिल्ली विश्वविद्यालय से पुरातत्व में पीएचडी धारक बताते हुए कहा कि उनकी पुस्तक “पुरातत्व की अनुसंधान प्रणाली” शोधार्थियों के लिए महत्वपूर्ण संदर्भ पुस्तक है।
उनका कहना है कि उन्हें वरिष्ठता के आधार पर अगस्त 2003 से प्रोफेसर पद पर पुनर्बहाल किया जाए तथा समस्त बकाया वेतन, वेतनवृद्धि और अन्य लाभ ब्याज सहित दिए जाएं।
ज्ञापन में उन्होंने यह भी आरोप लगाया है कि समान परिस्थितियों में अन्य शिक्षकों को नियमित कर दिया गया, जबकि उनके साथ भेदभाव किया गया।
उन्होंने संबंधित अधिकारियों के विरुद्ध आपराधिक मुकदमा दर्ज कराने तथा पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एजेंसी से जांच कराने की मांग की है।


