कागज़ पर बच्चा पहलवान बन रहा है, ज़मीन पर पसलियाँ गिनने लायक रह जाती हैं। सरकार कहती है हर बच्चा स्वस्थ हो और ठेकेदार कहता है हर पैकेट हल्का हो। दोनों अपने-अपने लक्ष्य पर पूरी ईमानदारी से लगे हैं।
एक किलो का पैकेट जब तराजू पर 800 ग्राम निकले तो समझ जाइए कि देश “विकास” की नई परिभाषा लिख रहा है। पुष्टाहार का वजन घट रहा है और भरोसा डाइटिंग पर है।
गर्भवती महिलाओं को दिया जाने वाला आटा-बेसन जिसकी पैकेट पर वजन 975 ग्राम लिखा है वो तो शायद भविष्य की योजना है। अभी 875 ग्राम से ही काम चलाइए, बाकी 100 ग्राम अगले चुनाव में जोड़ दिया जाएगा।
गर्भवती महिलाओं को दिया जाने वाला “पुष्टाहार” भी ऐसा है कि बच्चा पेट में ही पूछ रहा होगा “माँ, ये पोषण है या सरकारी वादा।
हलवा का पैकेट खोलो तो लगता है जैसे मिठास भी टेंडर के साथ कट गई हो।
“शंकर प्रेरणा महिला गृह उद्योग” नाम सुनकर लगता है कि यहाँ प्रेरणा मिलेगी लेकिन असल प्रेरणा यही मिलती है कि कम में ज़्यादा कैसे दिखाया जाए।
ये उद्योग नहीं जादूगरों की अकादमी है जहाँ 1 किलो को 800 ग्राम में बदलने की कला सिखाई जाती है। आंगनबाड़ी केंद्र अब बच्चों के पोषण के नहीं “घटतौली प्रशिक्षण केंद्र” बन गए हैं। बच्चे सीख रहे हैं कि गणित में 1000 ग्राम = 800 ग्राम होता है और शायद यही नई शिक्षा नीति का प्रयोगात्मक हिस्सा है।
पुष्टाहार के पैकेटों का 200 ग्राम माल किसी अफसर की चाय में घुल गया या किसी फाइल के नीचे दबकर “विकास” में समा गया, इसकी जांच कराई जानी चाहिए।
आप सोच रहे होंगे कि पुष्टाहार खाकर अगली पीढ़ी मजबूत होगी लेकिन यहाँ तो भ्रष्टाचार ही खाकर पुष्ट हो रहा है। हालांकि “घटतौली केंद्र” के संचालक ने बताया कि पैकेट में माल बराबर है। कभी-कभी माल कम हो जाता है। केंद्रों की पड़ताल करने पर पता चला कि कभी-कभी वाली समस्या सभी पैकेटों पर समान रूप से क़ायम है।
(@गंवार…महेंद्र गौड़ की कलम से)


