कन्नौज। उत्तर प्रदेश की सियासत में पीडीए (पिछड़ा, दलित और अल्पसंख्यक) समीकरण को मजबूत करने की कोशिशों के बीच कन्नौज में आयोजित एक सम्मेलन की कथित तौर पर खाली कुर्सियों ने राजनीतिक हलकों में सवाल खड़े कर दिए हैं।
जिस जिले को समाजवादी पार्टी अपनी सियासी ताकत का अहम केंद्र मानती है, वहां सम्मेलन में अपेक्षित भीड़ नहीं जुटने की चर्चा ने संगठन की तैयारियों और जनसंपर्क अभियान पर बहस छेड़ दिया है।
समाजवादी राजनीति में कन्नौज का अपना खास महत्व रहा है। ऐसे में यहां आयोजित पीडीए सम्मेलन में खाली कुर्सियों की तस्वीरें और चर्चाएं पार्टी के लिए असहज स्थिति पैदा कर सकती हैं।
सवाल यह है कि क्या पीडीए का संदेश जनता तक प्रभावी ढंग से पहुंच पा रहा है या फिर संगठनात्मक तैयारियों में कहीं कमी रह जा रही है?
सम्मेलन को लेकर उठ रही चर्चाओं के बीच नेताओं की मौजूदगी और जनता की भागीदारी के बीच अंतर को लेकर सवाल उठाए जा रहे हैं।
राजनीतिक कार्यक्रमों की सफलता केवल मंच पर मौजूद नेताओं की संख्या से नहीं, बल्कि आम लोगों की भागीदारी और उनके बीच संगठन की स्वीकार्यता से भी आंकी जाती है।
ऐसे में यदि किसी सम्मेलन में अपेक्षित संख्या में लोग नहीं पहुंचते, तो यह आयोजकों के लिए आत्ममंथन का विषय बन सकता है। हालांकि, खाली कुर्सियों के आधार पर किसी पार्टी के व्यापक जनाधार के बारे में अंतिम निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।
राजनीतिक आयोजनों में कुर्सियां कभी सत्ता की होड़ का प्रतीक बन जाती हैं, तो कभी खाली रहकर संगठन की तैयारियों पर सवाल खड़े करती हैं।
गोरखपुर में राजनीतिक कार्यक्रम के दौरान कुर्सी को लेकर कथित विवाद की चर्चाओं और कन्नौज में सम्मेलन की खाली कुर्सियों के बीच तुलना करते हुए सियासी तंज भी कसे जा रहे हैं।
एक तरफ कुर्सी हासिल करने की होड़ और दूसरी तरफ कुर्सियों का खाली रह जाना—यह विरोधाभास राजनीतिक दलों के लिए संदेश देता है कि संगठन की मजबूती के साथ जनता का भरोसा और भागीदारी भी जरूरी है।
सम्मेलन के बाद जिला कार्यकारिणी भंग किए जाने की खबर ने मामले को और चर्चा में ला दिया है। हालांकि, कार्यकारिणी भंग करने के आधिकारिक कारणों की पुष्टि के बिना इसे सीधे तौर पर सम्मेलन में कम भीड़ से जोड़ना उचित नहीं होगा।
फिर भी, घटनाक्रम ने संगठनात्मक जिम्मेदारी और कार्यक्रमों की तैयारियों को लेकर सवालों को हवा दी है। पीडीए के जरिए सामाजिक समीकरण मजबूत करने की रणनीति समाजवादी पार्टी के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है।
लेकिन किसी भी राजनीतिक अभियान की वास्तविक ताकत तब सामने आती है, जब उसका संदेश आम लोगों तक पहुंचे और वे स्वेच्छा से उससे जुड़ें।
कन्नौज का यह घटनाक्रम राजनीतिक दलों को याद दिलाता है कि मंच पर नेताओं की भीड़ और मैदान में जनता की मौजूदगी दो अलग-अलग बातें हैं।
आखिरकार जनता की भागीदारी, स्थानीय मुद्दों पर काम और संगठन की सक्रियता ही किसी राजनीतिक अभियान की प्रभावशीलता तय करती है।
सियासी सवाल यही है—क्या खाली कुर्सियां महज आयोजन की कमजोरी का संकेत हैं या संगठन को अपनी रणनीति पर दोबारा विचार करने का मौका दे रही हैं? इसका जवाब आने वाले राजनीतिक कार्यक्रमों और जनता की भागीदारी से ही मिलेगा।

