पाकिस्तान प्रायोजित इस हमले की जितनी निंदा की जाए, कम है, लेकिन इतना ही यह भी साफ है कि कश्मीर के मामले में इंटेलीजेंस की चौकसी और भारत सरकार की नीतियां बार-बार फेल हुई है.
हमले के तुरंत बाद गोदी मीडिया और संघी गिरोह का यह प्रचार भी अब पूरी तरह से झूठा साबित हो गया है कि पर्यटकों से उनका धर्म पूछ-पूछकर हिंदुओं को गोलियां मारी गई है.
साफ है कि इस घटना की आड़ में भाजपा और संघी गिरोह ‘हिंदू-मुस्लिम’ और ‘भारत-पाकिस्तान’ के नाम पर नफरत की राजनीति करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण करने के खेल में लग गया है, ताकि बिहार और कुछ राज्यों के होने वाले चुनावों में फायदा उठा सकें.
अब यह संभव है कि मुस्लिम विरोधी सांप्रदायिक भावना और पाकिस्तान विरोधी राष्ट्रवादी भावना उभारने के लिहाज से मोदी सरकार कोई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ भी कर दे.
इस आतंकी हमले में केवल हिन्दू ही नहीं, एक मुस्लिम भी जिनका नाम सैयद हुसैन शाह है और कुछ विदेशी पर्यटक भी मारे गए हैं. हमले के बाद पीड़ितों की सेवा में कश्मीर का मुस्लिम समुदाय जिस एकजुटता के साथ सामने आया, वह अभूतपूर्व है.
सोशल मीडिया में एक स्टोरी तैर रही है कि छत्तीसगढ़ के चिरमिरी के 11 लोगों को किस तरह एक स्थानीय मुस्लिम कपड़ा व्यापारी नजाकत अली ने बचाया है.
इस हमले में कर्नाटक से आए पर्यटक मंजूनाथ भी मारे गए हैं. हमले में जीवित बची उनकी पत्नी पल्लवी के इस वक्तव्य को भी नोट करने की जरूरत है-“उस दहशत और लाचारी के पल में तीन कश्मीरी युवक आए और हमें बचाया.
हमारी मदद करते हुए वे बिस्मिल्लाह, बिस्मिल्लाह कहते रहे. उन्होंने हमें सुरक्षित जगह पर पहुंचाया. मैं आज उन्हीं की वजह से ज़िंदा हूं. वे अब अजनबी नहीं रहे-वे मेरे भाई हैं.”
इस तरह की दसियों स्टोरी अभी और सामने आएंगी. यही हिंदू-मुस्लिम एकता की सिल्वर लाइन है जो न आतंकियों की गोलियों से मिटने वाली है और न संघी गिरोह की नफरत फैलाने वाली सांप्रदायिक राजनीति से, कश्मीर की असली ताकत यही है.
यह बात आईने की तरह साफ है कि इस हमले से कश्मीर के पर्यटन उद्योग का बहुत नुकसान होने जा रहा है. लेकिन इन हमलों के पीछे जो लोग हैं, वे कश्मीर के लोग तो नहीं ही हैं, क्योंकि कोई अपनी रोजी रोटी और आजीविका पर लात नहीं मारता.
असली दुश्मन तो वे लोग हैं, जो विभाजन, हिंसा और नफ़रत की राजनीति से फ़ायदा उठाते हैं. इस कत्लेआम के विरोध में कश्मीर घाटी बंद रही. इस बंद के समर्थन में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस,
पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी, पीपुल्स कॉन्फ्रेंस, अपनी पार्टी और माकपा सहित घाटी की लगभग सभी राजनैतिक धाराएं साथ आई. कई सामाजिक-धार्मिक और व्यापारिक संगठनों और नागरिक समाज के विभिन्न तबकों ने इस आतंकी हमले की खुलकर खिलाफत की है और बंद का समर्थन किया है.
घाटी में कई जगहों पर शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन भी हुए जिसमें प्रदर्शनकारियों ने हमले की निंदा की है. आतंकी हमले का ऐसा एकजुट विरोध पिछले 35 साल में पहली बार देखने को मिल रहा है.
घाटी में बंद की सफलता से हिंदुओं और मुस्लिमों के बीच दरार डालने की आतंकी कोशिशें नाकाम साबित हुई है. यह कश्मीर के सुखद भविष्य का संकेत है.
कश्मीर के मामले में संवेदनशील सैन्य सूचनाएं पाकिस्तान तक पहुंचाने के आरोप में जो लोग पकड़े गए हैं, उनमें से कई संघी गिरोह से ही जुड़े हुए हैं. अभी तक गिरफ्तार लोगों में न कोई मुस्लिम है, न ईसाई, और न ही कोई सिख या बौद्ध.
मनोज मंडल (मध्यप्रदेश), ध्रुव सक्सेना (बिहार), राजीव शर्मा- इनमें से ऐसे ही कुछ नाम हैं जिनके भाजपा से संबंध जगजाहिर थे. मध्यप्रदेश में तो थोक के भाव में आरएसएस के 11 कार्यकर्ता, जिनमें एक भाजपा पार्षद भी शामिल था, जासूसी के आरोप में गिरफ्तार हुए हैं.
इसलिए यह बात जोरदार ढंग से कही जा सकती है कि भाजपा-संघ का राष्ट्रवाद छद्म-राष्ट्रवाद है, जो व्यक्तिगत या राजनीतिक लाभ के लिए आम जनता की देशभक्ति की भावना का शोषण करता है.
संघी गिरोह को पहलगाम के आतंकी हमले में छुपे संकेतों को सही अर्थ ग्रहण करना चाहिए. कश्मीर की समस्या एक राजनीतिक समस्या है और इसलिए इसका समाधान भी राजनीतिक ही होगा.
कश्मीर की समस्या का जितना संबंध पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद से है, उतना ही संबंध भाजपा की नीतियों से भी है. इन नीतियों ने इस राज्य का विखंडन कर उसकी अस्मिता को रौंदने का काम किया है, इन नीतियों ने कश्मीर की कॉरपोरेट लूट के लिए दरवाजे खोले हैं.
संविधान के अनुच्छेद 370 को हटाकर कश्मीर की विशेष स्थिति को खत्म करने का मकसद भी यही था. भाजपा की नीतियों ने पूरे देश में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए जो मुस्लिम विरोधी भावनाएं पनपाई हैं,
वह पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद को खाद-पानी देने का काम करता है. इसलिए, यदि इस आतंकवाद का मुकाबला करना है, तो हिंदुत्व की राजनीति के साथ कॉरपोरेटों के गठजोड़ को शिकस्त देने के लिए आम जनता को लामबंद करना होगा, कश्मीर के संदर्भ में असली राजनैतिक चुनौती यही है.
(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं। संपर्क : 94242-31650)


