कराहते बुन्देलखण्ड में उन्माद भड़काने की मुहिम आलेख: बादल सरोज (PART-2)

gorakhpur halchal

बागेश्वर धाम के मौजूदा धामाधीश इस देश को हिन्दू राष्ट्र बनाने के पुरजोर समर्थक हैं, पिछले कई वर्षो से वे इसका एलान करते रहते है; इसलिए जाहिर है कि वे भाजपा की आँखों के तारे होंगे ही, है भी.

मगर सब कुछ कहने-सुनने के बावजूद वे कांग्रेस के भी कम दुलारे नहीं है. इसके नेता कमलनाथ मुख्यमंत्री रहते हुए भी इनके दरबार में ढोक लगा चुके हैं, नकद दक्षिणा देकर उनके प्रवचन अपने छिंदवाड़ा में करवा चुके हैं.

इस बार भी उनके साथ यात्रा में सिर्फ भाजपा या उसके संगी-साथी-बाबे इत्यादि ही नही चल रहे, कांग्रेस के विधायक जयवर्धन सिंह भी पहले ही दिन पहुंच गए.

🔵 जयवर्धन सिर्फ विधायक भर नहीं हैं, वे पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह के पुत्र और उनके राजनीतिक वारिस भी हैं. उनके जाने से ज्यादा चौंकाने वाला उनका बयान था, जो उन्होंने इस यात्रा में चलते हुए दिया.

कांग्रेस के इस युवा विधायक ने सिद्धांत जैसा देते हुए कहा कि “हर धर्म की शुरुआत किसी न किसी स्थान से हुई है और हिन्दू धर्म की शुरुआत भारत से हुई है. इसलिए भारत स्वाभाविक रूप से हिन्दू राष्ट्र है.“ यह ठीक वही बात है, जिसे पहले कभी कमलनाथ ने कहा था.

🔵 ऐसी बातों से कांग्रेस का राजनीतिक-वैचारिक दारिद्र्य और साम्प्रदायिकता की उसकी अधकचरी समझ का नमूना मिल जाता है. यह पता चल जाता है कि उन्होंने महात्मा गाँधी को कितना पढ़ा है, नेहरू को कितना जाना है.

जयवर्धन के जाने के बाद तो जैसे बाकी कांग्रेसियों को हरी झंडी ही मिल गयी और जिस पार्टी से संविधान सम्मत अवधारणा के अनुरूप धर्माधारित राष्ट्र के विरोध में

जनता को संगठित कर उसे मैदान में उतारने की उम्मीद की जाती है, उसके बड़के नेता हिन्दू राष्ट्र बनाने की चाहत के साथ सडकों पर उतर रहे हैं.

🔵 160 किलोमीटर चलकर 9 दिन में बागेश्वर से ओरछा पहुँचने वाली सनातनी हिन्दू राष्ट्र बनाने की घोषित इच्छा वाली यह यात्रा उस इलाके में घूम रही है, जिसे बुंदेलखंड कहा जाता है.

आर्थिक शैक्षणिक और मानव विकास सूचकांक के मामले में भारत के सबसे पिछड़े इलाकों में से एक यह बुन्देलखंड पिछले 5-7 वर्षो से लगातार सूखे की चपेट में है.

खेती लगभग चौपट है, उद्योग धंधे पहले से ही कम थे, जो थे, वे कराह रहे हैं. दीनहीन रोजगार की तलाश में पलायन करने वाले सबसे ज्यादा भारतीय इसी बुंदेलखंड से होते हैं.

इतना ही नहीं, सामाजिक रूप से भी यह इलाका अभी भी सामंती क्रूरता की जकड़न में है. दलितों और स्त्रियों की तो बात ही दूर रही, तुलनात्मक रूप से बेहतर हालात वाली,

ओबीसी में आने वाली खेतिहर जातियां सामंतों के जुल्मो-सितम से परेशान है, उनकी यातनाओ के बूटों तले रौंदी जा रही हैं. फिल्मों में दिखाए जाने वाले सामंती जुल्मों वाले इस इलाके से शायद ही ऐसा कोई दिन गुजरता हो,

जब कोई न कोई भयावह खबर न आती हो.  छतरपुर से निवाड़ी, मऊरानीपुर होते हुए ओरछा पहुँचने वाला यह उन्मादी अभियान जीवन के वास्तविक सवालों को पीछे धकेल

अंततः जिस तरह का समाज बनाना चाहता है, खुद ये इलाके और जिनमें ये आते है, वह बुंदेलखंड उसका जीता जागता उदाहरण है.

वह इस बात का भी उदाहरण है कि यदि वंचनाओं और यातनाओं को आंदोलनों और संघर्षों में संगठित नहीं किया जाता, तो उनके विडम्बनाओं में तब्दील होने की आशंकाओं के संभावनाओं में बदलने में देर नहीं लगती.

(लेखक ‘लोकजतन’ के संपादक और अखिल भारतीय किसान सभा के संयुक्त सचिव हैं-संपर्क: 94250-06716)

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *