भारत-अमेरिका व्यापार समझौते में नया ट्विस्ट: ट्रंप कैंप बन रहा सबसे बड़ा रोड़ा
26 जनवरी 2026 को गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत और अमेरिका के बीच चल रही व्यापार वार्ताओं ने एक बार फिर सुर्खियां बटोरी हैं। हाल ही में एक अमेरिकी सांसद ने सनसनीखेज दावा किया है कि डोनाल्ड ट्रंप, उनकी टीम के जेडी वेंस और पूर्व ट्रेड रिप्रेजेंटेटिव पीटर नवारो इस डील के सबसे बड़े विरोधी बन चुके हैं। सांसद के अनुसार, ट्रंप कैंप भारत के साथ किसी भी बड़े व्यापार समझौते को लेकर बहुत सख्त रुख अपना रहा है।
भारत की अडिग स्थिति: किसानों और डेयरी सेक्टर पर कोई समझौता नहीं
भारतीय पक्ष ने कई बार स्पष्ट कर दिया है कि वह अपने किसानों, डेयरी उत्पादकों और छोटे उद्योगों के हितों से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं करेगा। अमेरिका लगातार मांग कर रहा है कि भारत अमेरिकी कृषि उत्पादों (खासकर चिकन, बीफ, डेयरी और सोयाबीन) पर लगने वाले उच्च टैरिफ को कम करे। भारत का कहना है कि ऐसे कदम से देश के लाखों किसान और डेयरी सहकारी प्रभावित होंगे।
वर्तमान में भारत अमेरिकी डेयरी उत्पादों पर 30-60% तक टैरिफ लगाता है, जबकि अमेरिका भारत के कुछ कृषि उत्पादों पर भी प्रतिबंधात्मक नीतियां अपनाता है। दोनों पक्षों के बीच यह टैरिफ पैरा अब तक का सबसे बड़ा गतिरोध बना हुआ है।
ट्रंप, वेंस और नवारो: अमेरिकी सांसद का आरोप
अमेरिकी कांग्रेस के एक प्रभावशाली सांसद (जिन्होंने नाम न छापने की शर्त पर बात की) ने दावा किया कि:
- डोनाल्ड ट्रंप व्यक्तिगत रूप से भारत के साथ बड़े पैमाने पर ट्रेड डील के खिलाफ हैं।
- जेडी वेंस (ट्रंप के करीबी सलाहकार और सीनेटर) अमेरिकी मैन्युफैक्चरिंग और फार्मिंग लॉबी के दबाव में भारत पर ज्यादा दबाव बनाने की वकालत कर रहे हैं।
- पीटर नवारो, जो ट्रंप के पहले कार्यकाल में ट्रेड नीति के कठोर चेहरा रहे, अभी भी बैकग्राउंड में सक्रिय हैं और भारत को “ट्रेड डेफिसिट बढ़ाने वाला देश” बताकर डील रोकने की कोशिश कर रहे हैं।
सांसद ने कहा, “ट्रंप कैंप का मानना है कि भारत के साथ कोई भी डील अमेरिकी किसानों और वर्कर्स के हितों के खिलाफ जाएगी। वे चाहते हैं कि भारत पहले अमेरिकी मांगें पूरी करे, फिर बात आगे बढ़े।”
दोनों देशों के बीच मौजूदा स्थिति
- भारत ने अमेरिका से कहा है कि वह जीएसटीआईआर और डिजिटल सर्विस टैक्स जैसे मुद्दों पर भी लचीलापन दिखाए।
- अमेरिका भारत से फार्मास्यूटिकल्स, आईटी और टेक्सटाइल सेक्टर में ज्यादा मार्केट एक्सेस की मांग कर रहा है।
- दोनों पक्षों ने 2025 में कई दौर की बातचीत की, लेकिन कोई ब्रेकथ्रू नहीं हुआ।
- ट्रंप प्रशासन के आने के बाद (जनवरी 2025 से) वार्ता की गति धीमी पड़ गई है।
भारत के लिए क्या दांव पर लगा है?
यदि समझौता नहीं होता है तो भारत को अमेरिकी बाजार में टैरिफ बढ़ोतरी का खतरा है।
वहीं अमेरिका को भारत जैसे बड़े उभरते बाजार से दूरी बनानी पड़ सकती है। विशेषज्ञों का मानना है कि
दोनों देशों को मिडिल ग्राउंड ढूंढना होगा, लेकिन ट्रंप कैंप का सख्त रवैया इसे मुश्किल बना रहा है।
आगे क्या?
अगले कुछ महीनों में दोनों देशों के बीच उच्च स्तरीय बैठकें प्रस्तावित हैं। भारत ने साफ कर दिया है कि
वह “राष्ट्रीय हितों से समझौता नहीं करेगा”। अब देखना
यह है कि क्या ट्रंप प्रशासन लचीलापन दिखाता है या फिर दोनों देश अलग-अलग रास्ते चुनते हैं।
भारत-अमेरिका व्यापार समझौता न केवल आर्थिक, बल्कि सामरिक महत्व का भी है

