जेब में ठूंसा लोकतंत्र! व्यंग्य आलेख: संजय पराते (PART-2)
लेकिन बड़े वाले ऐसी किसी मजबूरी को जेब में थोड़े ही रखते हैं! मजबूरी में लोकतंत्र की लाज रखने जायेंगे, तो हो गया राजकाज, हो गया समस्या समाधान!! अब बड़े वाले साहब का आदेश था, तो छोटे वालों ने भी आव देखा न ताव। यह विधवा पहले उनसे भी चपर-चपर कर चुकी थी, सो मां-बेटी…


