अमृतकाल के बजट में जीवनामृत नहीं है आलेख: जे के कर

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केन्द्र सरकार ने साल 2025-26 का आम बजट पेश कर दिया है. अमृतकाल के इस बजट के स्वास्थ्य बजट में जीवनामृत याने जरूरत के मुताबिक पर्याप्त धन का अभाव है.

साल 2024-25 में स्वास्थ्य बजट रिकवरी को छोड़कर (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण+स्वास्थ्य रिसर्च+आयुष) 93471.76 करोड़ रुपयों का था, उसकी तुलना में साल 2025-26 का स्वास्थ्य बजट रिकवरी को छोड़कर (स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण+स्वास्थ्य रिसर्च+आयुष) 103851.46 करोड़ रुपयों का है.

इस तरह से मात्र 11.10 % की बढ़ोतरी की गई है जो कि बढ़ती महंगाई को देखते हुये नाकाफी है. इसकी तुलना हम गोल्ड स्टैंडर्ड से कर के देखते हैं. 31 जनवरी 24 के दिन 24 कैरेट के 10 ग्राम सोने की कीमत 63,970 रुपये थी

और 31 जनवरी 2025 के दिन इसी 10 ग्राम सोने की कीमत 83,203 रुपये की रही है. इस तरह से सोने के दाम में 30.06 % की बढ़ोतरी हुई है. चिकित्सा के बढ़ते खर्च मसलन दवाओं के बढ़ते दाम,

उपकरणों के बढ़ते दाम, विभिन्न जांचो के बढ़ते दाम, सर्जरी के बढ़ते दाम, चिकित्सकों के बढ़ते फीस, अस्पताल के बिस्तरों के बढ़ते किराया के चलते, बजट में की गई बढ़ोतरी नाकाफी सिद्ध होती है.

केन्द्रीय बजट के एक दिन पहले संसद में पेश आर्थिक सर्वे 2024-25 के अनुसार साल 2021-22 में हमारे देश में (केन्द्र+राज्य सरकारें) ने स्वास्थ्य पर सकल घरेलू उत्पादन का 1.87 % खर्च किया था.

इसी साल जनता को अपने जेब से स्वास्थ्य पर जीडीपी का 1.51% खर्च करना पड़ा. बता दें कि आर्थिक सर्वे 2024-25 के अनुसार साल 2021-22 में हमारे देश में स्वास्थ्य पर जीडीपी का 3.8% खर्च किया गया,

जबकि स्वास्थ्य क्षेत्र के जानकारों के मुताबिक हमारे जैसे देश में स्वास्थ्य पर सरकार (केन्द्र+ राज्य सरकारों) द्वारा 6% तक खर्च किया जाना चाहिये.

बता दें कि राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति 2017 में 2025 तक सकल घरेलू उत्पादन या जीडीपी का 2.5% स्वास्थ्य सेवा पर सरकारी खर्च का लक्ष्य रखा गया है. वैसे भी कल्याणकारी राज्य की अवधारणा के अनुसार सरकार को जनता के स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च करना चाहिये.

यदि जनता स्वस्थ्य नहीं होगी, तो मजबूत राष्ट्र के निर्माण का दावा किस आधार पर किया जा सकता है? हमारे देश में कोई बहुत अमीर है, तो कोई इतना गरीब कि उसके लिये अपने लिये दो जून की रोटी का जुगाड़ करना भी मुश्किल है.

इस कारण से राज्य (अर्थात् सरकार) की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता के स्वास्थ्य पर ज्यादा खर्च करें. वैसे भी मानव समाज के विकास क्रम में राज्य की उत्पत्ति समाज में असमानता के बावजूद उसे चलायमान रखने के लिये हुई थी.

आइये स्वास्थ्य पर जीडीपी का खर्च कैसे होता है, उसे एक उदाहरण से समझने की कोशिश करते हैं. केन्द्र सरकार द्वारा ताजा जारी नेशनल हेल्थ प्रोफाईल 2023 के अनुसार, जिसमें साल 2019-20 का आंकड़ा दिया गया है,

स्वास्थ्य पर जीडीपी का 3.27% खर्च किया गया, जिसमें सरकार (केन्द्र+राज्य सरकारें) की भागीदारी 41.4% थी. यह जीडीपी का 1.35% का होता है. इसमें केन्द्र सरकार की भागीदारी 35.8% तथा सभी राज्य सरकारों की भागीदारी 64.2% की थी.

इस कारण से जनता को अपनी जेब से 1.54% अर्थात् प्रति व्यक्ति 2,289 रुपये खर्च करने पड़े. वहीं आर्थिक सर्वे 2024-25 के अनुसार, साल 2021-22 में स्वास्थ्य पर कुल खर्च का सरकार ने 48% तथा जनता ने 39.4% खर्च किया.

 

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