जेब में ठूंसा लोकतंत्र! व्यंग्य आलेख: संजय पराते (PART-2)

gorakhpur halchal

लेकिन बड़े वाले ऐसी किसी मजबूरी को जेब में थोड़े ही रखते हैं! मजबूरी में लोकतंत्र की लाज रखने जायेंगे, तो हो गया राजकाज, हो गया समस्या समाधान!!

अब बड़े वाले साहब का आदेश था, तो छोटे वालों ने भी आव देखा न ताव। यह विधवा पहले उनसे भी चपर-चपर कर चुकी थी,

सो मां-बेटी को तत्काल गिरफ्तार करके जेल दाखिल कर दिया गया। वीडियो दिखा रहा है कि महिला पुलिस दोनों को ले जा रही है.

कलेक्टर नाम का बड़ा वाला जीव जन सेवक था, जनता की सेवा के लिए पैदा हुआ था. लेकिन योगी-मोदी राज में तो जनता की परिभाषा तक बदल गई है.

अब तो चुनाव आयोग भी जनता से कह रहा है कि पहले अपने को जनता सिद्ध करो. इस बड़े वाले जन सेवक ने भी सोचा होगा कि मैनपुरी की यह विधवा महिला, जो इतनी चपर-चपर कर रही है, हो न हो, सपाई ही होगी.

अब कोई सपाई, कोई कांग्रेसियाई, कोई बसपाई या कोई कम्युनिस्ट भला जनता कैसे हो सकती है? जनता कहलाने के लिए तो भाजपाई होना जरूरी है.

इसलिए जो जनता ही नहीं है, भला कलेक्टर उसकी जन सेवा क्यों और कैसे करें? लेकिन मामला गोदी प्रशासन के गोदी मीडिया तक सीमित रहता, तो चल जाता.

सोशल हो गया और सोशल मीडिया से सत्ता के गलियारों तक उसकी थू-थू करते पहुंच गया. लखनऊ को लगा कि

बहुत ज्यादा हो गया है, क्योंकि अभी तक हिंदू राष्ट्र बना नहीं है और लोकतंत्र भी जेब में ही सही, लेकिन जिंदा है और सांसें ले रहा है.

कलेक्टर साहब की उससे बड़े वाले साहब ने पेशी ली. इस बड़े वाले की उससे भी बड़े वाले ने पहले ही पेशी ले ली थी कि

वीडियो जैसे-जैसे वायरल हो रहा है, सरकार की नंगाई जनता की आंखों में चुभ रही है.
बड़े वाले ने अपने से छोटे कलेक्टर साहब को समझाया कि भैया

अपनी जेब में ठूंसे लोकतंत्र का भी थोड़ा बहुत ख्याल कर लिया करो, क्योंकि अभी संपूर्ण हिंदू राज नहीं आया है.

अभी तक तो केवल बुलडोजर राज तक ही पहुंचे हैं. लेकिन इस बुलडोजर राज को ऊपर वाला सुप्रीम कोर्ट भी मानने के लिए तैयार नहीं है.

सो थोड़ा धैर्य रखो, इस समझाईश का छोटे वाले जन सेवक पर असर पड़ना ही था. उसे भी अपने जेब में ठूंसे लोकतंत्र से बाहर झांकती लोक-लाज का ख्याल आया.

विधवा महिला और उसकी बेटी को छोड़ने का आदेश जारी हो गया. यही है योगी प्रशासन का असली चेहरा, जिसे उत्तरप्रदेश की पूरी जनता आज झेल रही है.

जनता की समस्याओं का समाधान करने का उसका तरीका यही है कि जनता का मुंह बंद कर दो, चाहे उसे जेल में ही क्यों न डालना पड़े.

जो सरकार अपने प्रदेश में कानून का नहीं, बुलडोजर का राज स्थापित करना चाहती हो, उसे एक मिनट भी सत्ता में बने रहने का संवैधानिक हक नहीं है.

यह मामला बताता है कि सरकार प्रशासन नहीं चला रही है, बल्कि प्रशासन ही सरकार को चला रहा है.

वरना ऐसे बदतमीज और बददिमाग कलेक्टर को इस घटना के बाद ही तुरंत हटा दिया जाता। लेकिन वे पूरी दमदारी से अपनी जगह विराजमान थे.

यह घटना 10 माह पुरानी है, पिछले साल दिसंबर की है. तब से अब तक तीन दर्जन से ज्यादा समाधान दिवस यह सरकार मना चुकी है.

लेकिन विधवा मां-बेटी की समस्या ज्यों-की-त्यों है. जमीन हड़पू इस बड़े वाले पर हाथ डालने की हिम्मत बुलडोजर बाबा की भी अभी तक नहीं हुई है.

दीवार पर लिखी इबारत साफ दिखा रही है कि वोट चोरी से बनी सरकार का संपूर्ण समाधान करने का दिन नजदीक आता जा रहा है.

(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं. संपर्क: 94242-31650)

(DISCLAIMER-यह लेखक के निजी विचार हैं गोरखपुर हलचल का इससे कोई सरोकार नहीं है)

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