मोदी जी आए बिहार के मधुबनी में, बिहार में जल्द ही चुनाव भी तो होना है. सोचा, पब्लिक का दिमाग गर्म है, बेनिफिट ले सकते हैं. फिर क्या था, आंतकवाद पर जमकर बरसे.
मधुबनी में हिंदी में तो हिंदी में, अंगरेजी में भी बरसे, ताकि इंग्लैंड-अमरीका तक सुनाई दे. आतंकवादियों को और उनके मददगारों को मिट्टी में मिला देने का एलान कर दिया.
ऐसी सजा देने की धमकी दे डाली जिसकी किसी ने कल्पना तक नहीं की होगी. फिर बिहार के लिए तोहफों की एक और किस्त का एलान किया. दो रेलगाड़ियों को हरी झंडी दिखाई, मंच पर नीतीश कुमार के साथ खी-खी की और दिल्ली आ गए.
राहुल गांधी कश्मीर हो आए, पर मोदी जी कश्मीर नहीं आए. वैसे, मणिपुर तो उनका दो साल से इंतजार कर रहा है, कश्मीर का नंबर तो अभी चार-छह रोज पहले ही लगा है!
गजब देश है, तो मोदी जी के विरोधी भी कम अजब नहीं हैं. पहलगाम की खबर आने के बाद से, एक ही बात का शोर मचा रहे हैं कि यह तो सुरक्षा चूक हुई. फिर खुद ही सवाल करने लग जाते हैं कि इस सुरक्षा चूक के लिए जिम्मेदार कौन है?
बेचारी सरकार कह रही है कि दु:ख है, गहरा दु:ख है, पर ये चूक और उसकी जिम्मेदारी पर ही अड़े हुए हैं. विपक्ष वालों ने चूक का इतना शोर मचाया, इतना शोर मचाया कि बेचारे छोटे वाले मंत्री, किरण रीजिजू से एक चूक तो करवा ही ली.
अगले के मुंह से निकल ही गया कि चूक हुई थी, सब कुछ अच्छा चलने के बावजूद, कुछ चूक हुई थी! क्या फायदा हुआ? बेचारे को बाद में वीडियो का चूक वाला हिस्सा काटकर बाहर करना पड़ा.
पर तब तक जुबान से निकले हुए शब्द, वह भी वीडियो में दर्ज शब्द, दूर-दूर तक फैल चुके थे. खैर! जैसे चूक की बात मानकर भी सरकार को वापस लेनी पड़ी है, वैसे ही कहीं जिम्मेदार कौन, का अपना जवाब भी सरकार को वापस नहीं लेना पड़ जाए.
सर्वदलीय बैठक में सरकार ने कहा कि बैसारण घाटी में कोई सुरक्षा नहीं थी, क्योंकि सरकार को किसी ने बताया ही नहीं था कि वहां सैलानी जा रहे थे. सारी गलती मारने वालों के बाद अगर मरने वालों की नहीं भी मानी जाए,
तब भी होटलवालों और टूर ऑपरेटरों की जरूर थी; सरकार की इजाजत के बिना ही घाटी को सैलानियों के लिए खोल दिया! पर पता नहीं क्यों पहलगाम वाले और जम्मू-कश्मीर की सरकार वाले इस पर अड़े हुए हैं कि
“बैसारण की घाटी तो हमेशा से, ज्यादा बर्फ के टैम को छोडक़र, पूरे साल ही खुली रहती है. ना किसी से इजाजत ली जाती है, ना किसी को जानकारी दी जाती है.”
सरकार तो इतना बताए कि वहां से सीआरपीएफ किस के कहने पर हटाई गयी थी। दिल्ली की सरकार को अगर यह बहाना भी वापस लेना पड़ गया, तो सर्वदलीय बैठक में से बचेगा क्या ; बाबा जी का ठुल्लू। पर ठुल्लू बचा कैसे कहूं!
(राजेंद्र शर्मा वरिष्ठ पत्रकार और ‘लोकलहर’ के संपादक हैं।)


