युद्ध की परिस्थितियों में सरकार और सत्ताधारी पार्टी की जिम्मेदारी पूरे देश को एकजुट करने की होती है, इसके बजाय वह देश को और विभाजित करने का काम कर रही थी.
इस सबके बावजूद, पूरा विपक्ष और पूरा देश सरकार के साथ एकजुट था कि वह इस आतंकी हमले का प्रतिकार करने के लिए किसी भी प्रकार का कदम उठाने को स्वतंत्र है.
मोदी सरकार ने कूटनीति के जरिए पाकिस्तान की घेराबंदी करने के बजाए, युद्धनीति को प्राथमिकता दी. पहलगाम में आतंकवादी हमले की अभी तक मोदी सरकार ने साफ-साफ जिम्मेदारी नहीं ली है.
बैसरन घाटी में सुरक्षा बलों की अनुपस्थिति के बारे में सर्वदलीय बैठक में उसने जो सफाई दी है, वह गले उतरने लायक नहीं है और उसकी इस सफाई पर प्रश्नचिन्ह भी लग चुके हैं.
आम जन मानस में यह सवाल भी तैर रहा है कि हर चुनाव के पहले ही आतंकी हमले क्यों होते हैं और इसकी आड़ में एक धार्मिक समुदाय को निशाने पर लेकर युद्धोन्मादी वातावरण क्यों बनाया जाता है?
जिस तरह पहले की आतंकी घटनाओं की कोई विश्वसनीय जांच रिपोर्ट सामने नहीं आई हैं, पहलगाम की घटना के भी कोई तथ्य सामने नहीं आने वाले हैं.
अब अगला सवाल यह है कि इस सीमित युद्ध का जो हश्र हुआ, क्या उसकी ही कोई जिम्मेदारी मोदी सरकार लेने के लिए तैयार है? इस युद्ध विराम से पहले हमारी सेना को भी विश्वास में लिया गया है, ऐसा भी नहीं लगता.
यह हमारी सेना के शौर्य और सैनिकों की शहादत का अपमान नहीं, तो और क्या है! आज तक हम इस नीति का पालन कर रहे थे कि भारत और पाकिस्तान के बीच का कोई भी विवादित मुद्दा हमारा आपसी मामला है और दोनों देश आपसी संवाद के जरिए कश्मीर सहित सभी मुद्दों को सुलझा सकते हैं.
शिमला समझौते की भावना भी यही है, पाकिस्तान ने बार-बार इस समझदारी का उल्लंघन किया है, लेकिन उसे कभी सफलता नहीं मिली और हमारी सरकार की सफल कूटनीति ने विश्व जनमत को हमारे पक्ष में बनाए रखा.
लेकिन वर्ष 1971 के बाद यह पहली बार हो रहा है कि भारत-पाक विवाद का हल अमेरिका की मध्यस्थता में खोजा जा रहा है. यह आश्चर्य की बात है कि युद्ध विराम की घोषणा भारत या पाकिस्तान नहीं, अमेरिका करता है.
पाकिस्तान इसकी मीडिया में पुष्टि करता है और भारत दबी जुबान “ऐसा नहीं” कहने पर मजबूर है, लेकिन अमेरिका की मध्यस्थता का खंडन करने की हिम्मत नहीं करता.
अमेरिका ही यह घोषणा भी करता है कि “दोनों पक्ष बड़े मुद्दों पर किसी तटस्थ स्थल पर वार्ता के लिए सहमत हो गए हैं.“ अब यह बड़ा मुद्दा कश्मीर के सिवा और क्या हो सकता है?
यह स्पष्ट नहीं है कि “किसी तटस्थ स्थल” पर अमेरिका की मौजूदगी होगी या नहीं? लेकिन संचार-प्रौद्योगिकी के इस युग में अमेरिका की भौतिक उपस्थिति कोई मायने नहीं रखती.
युद्ध विराम में मध्यस्थता और बड़े मुद्दों पर वार्ता की अमेरिका की घोषणा से ही जाहिर है कि अब भविष्य में कश्मीर मुद्दे का अंतर्राष्ट्रीयकरण होने जा रहा है, जो पाकिस्तान के मन-माफिक है.
इसलिए युद्ध विराम की अमेरिकी घोषणा को पाकिस्तान अपनी जीत और भारत की हार बता रहा है, तो इसमें गलत क्या है? अमेरिका चाहता तो पाक प्रायोजित आतंकवाद पर लगाम लगा सकता था.
लेकिन अमेरिका ही है, जो पूरी दुनिया में आतंकवाद का निर्यात करता है और आतंकवादियों को पनाह भी देता है. पाकिस्तान के राजनेताओं ने भी, जो जब-तब सत्ता में भी रहे हैं,
यह माना है कि उनकी जमीन पर आतंकवाद अमेरिका के इशारे पर और उसके हितों के लिए पाला-पोसा गया है. इसलिए भारत में आतंकवाद केवल पाक-प्रायोजित ही नहीं है, अमेरिका-समर्थित आतंकवाद भी है.
इसलिए पाकिस्तान के खिलाफ लड़ना जितना जरूरी है, उससे ज्यादा जरूरी आतंकवाद के सरगना अमेरिका के खिलाफ लड़ना है. लेकिन मोदी सरकार के पास बाबर और औरंगजेब के औलादों के खिलाफ लड़ने की ताकत तो है, अमेरिका के खिलाफ चूं तक करने की हिम्मत नहीं है.
जब अमेरिका हमारे प्रवासी देशवासियों को जंजीर से जकड़कर हमारी ही धरती पर पटक रहा था, तो इस अपमान के खिलाफ मोदी सरकार की न केवल घिग्घी बंधी हुई थी,
बल्कि संसद के अंदर उसने अमेरिका के इस कुकृत्य को सही भी ठहराया था, जबकि पूरी दुनिया अमेरिका की इस दादागिरी के खिलाफ लड़ रही थी.
इसलिए इस सीजफायर के लिए मध्यस्थता कर रहे अमेरिका की किन शर्तों को भारत ने माना है, इसका भी खुलासा उसे आम जनता के सामने करना चाहिए.
दो देशों के बीच का युद्ध वास्तव में उन देशों की सत्ताधारी पार्टियों और शासक वर्ग के बीच का युद्ध होता है, जिसमें जनता को सुनियोजित रूप से खींचा जाता है.
आजादी के बाद से ही भारतीयों के मन में पाकिस्तानी जनता के खिलाफ और पाकिस्तानियों के मन में भारतीय जनता के खिलाफ नफरत पैदा करने का काम होता रहा है.
भारत-पाक के इस सीमित युद्ध के जरिए दोनों देशों के सत्ताधारियों के हित साधे गए हैं. पाकिस्तान में सैन्य शासकों ने वैधता प्राप्त करने की कोशिश की है, तो भारत में मोदी सरकार ने बिहार चुनाव को साधने की.
वास्तव में तो सेना को, उसकी इच्छा-अनिच्छा के परे, युद्ध की भट्टी में ही झोंकने का काम किया गया है. वह एक लोकतांत्रिक सरकार के अधीन अपना सैन्य कर्तव्य ही पूरा कर रही थी.
अमेरिका की मध्यस्थता में हुए इस युद्ध विराम ने वास्तव में भारत माता के माथे के सिंदूर को थोड़ा-सा और पोंछने का ही काम किया है.
(लेखक अखिल भारतीय किसान सभा से संबद्ध छत्तीसगढ़ किसान सभा के उपाध्यक्ष हैं- संपर्क: 94242-31650


