क्या अब हम ‘सच्चा इतिहास’ फ़िल्मों के ज़रिये पढ़ेंगे! आलेख: मुकुल सरल (PART-2)

gorakhpur halchal

पिछले कुछ सालों की प्रमुख प्रोपेगैंडा फ़िल्मों का ज़िक्र करें, तो ‘द कश्मीर फाइल्स’ (2022) और ‘द केरला स्टोरी’ (2023) के नाम प्रमुख रूप से हमारे सामने आते हैं.

‘कश्मीर फाइल्स’ में कश्मीरी पंडितों के पलायन और नरसंहार को एक विशेष दृष्टिकोण से दिखाया गया. इसी तरह ‘केरला स्टोरी’ में केरल की लड़कियों के कथित इस्लामी कट्टरपंथ में फंसने और आईएसआईएस में शामिल होने की कहानी दिखाई गई.

फ़िल्म में यह दावा किया गया कि केरल की हज़ारों लड़कियों को इस्लामिक कट्टरपंथ में फंसाकर आतंकवादी संगठनों में भेजा गया, जबकि इस दावे को कई संगठनों और राज्य सरकार ने ख़ारिज किया.

केरल के मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन ने फ़िल्म की आलोचना करते हुए इसे ‘संघ परिवार की झूठ की फैक्ट्री का उत्पाद’ कहा. उन्होंने दूरदर्शन पर इस फिल्म के प्रसारण के निर्णय की भी निंदा की और इसे आम चुनाव से पहले तनाव बढ़ाने का प्रयास बताया.

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी इस फ़िल्म की आलोचना करते हुए इसे केरल की वास्तविकता से परे कहा. उन्होंने फ़िल्म के एक पोस्टर को साझा करते हुए ट्वीट किया, “यह आपकी केरल की कहानी हो सकती है, लेकिन यह हमारी केरल की कहानी नहीं है.”

फ़िल्म के रिलीज़ को रोकने के लिए सुप्रीम कोर्ट में याचिकाएं दायर की गईं, जिनमें इसे ‘घृणा फैलाने वाला’ और ‘ऑडियो-विज़ुअल प्रोपेगैंडा’ बताया गया.

हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सेंसर बोर्ड की मंज़ूरी का हवाला देते हुए हस्तक्षेप से इंकार कर दिया. लेकिन विवाद बढ़ने पर फ़िल्म के ट्रेलर के विवरण में ‘32,000 महिलाओं’ के स्थान पर ‘3 महिलाओं’ का उल्लेख किया गया, यानी निर्माता अपने पहले के दावे से पीछे हट गए.

इसी तरह कई फ़िल्मों को लेकर विवाद उठे हालांकि ज़्यादातर प्रोपेगैंडा फ़िल्म चल नहीं पाईं और बॉक्स ऑफ़िस पर फ्लॉप रहीं. कुछ पीरियड फ़िल्म यानी जिन्हें ऐतिहासिक पृष्ठभूमि में बनाने का दावा किया गया,

वे भी अपने ख़राब निर्देशन, अभिनय या एकतरफ़ा नैरेटिव की वजह से अपना खर्चा भी नहीं निकाल पाईं. अक्षय कुमार और कंगना रनौत की कई फ़िल्में इसी लाइन में शुमार की जा सकती हैं.

कंगना रनौत की अभी आई फ़िल्म ‘इमरजेंसी’ का भी हाल बुरा रहा. सेंसर बोर्ड में फंसने की वजह से इस फ़िल्म की रिलीज़ बार-बार टली और अंतत: यह जनवरी 2025 में परदे पर आ पाई.

इस फ़िल्म का निर्देशन, लेखन कंगना ने ही किया और मुख्य भूमिका भी ख़ुद ही निभाई. यह फ़िल्म 1975 में लगाए गए आपातकाल और इंदिरा गांधी के व्यक्तित्व पर केंद्रित थी लेकिन इसे भी दर्शकों ने ख़ास पसंद नहीं किया.

इसी तरह 2019 में एक फ़िल्म आई थी–“पीएम नरेंद्र मोदी,” इसका निर्देशन ओमंग कुमार ने किया था और अभिनेता विवेक ओबेरॉय ने नरेंद्र मोदी की भूमिका निभाई थी, इसे बायोपिक फ़िल्म कहा गया, लेकिन यह भी फ्लॉप रही.

आमतौर पर दर्शक भी समझता है कि इस तरह की फ़िल्मों का उद्देश्य एक ख़ास राजनीतिक विचारधारा को बढ़ावा देना है और या तो फेक नैरेटिव है या फिर सच्चाई को अतिरंजना के तड़के के साथ सेलेक्टिव यानी चुनिंदा तरीके से पेश किया गया है.

साथ ही कुछ निर्माता-निर्देशकों और अभिनेताओं ने इसे सफलता का शॉर्टकट मान लिया है. साथ ही सत्ता के लाभ का ज़रिया भी बना लिया है, कंगना रनौत इसी तरह देखते-देखते आज भारतीय जनता पार्टी की सांसद बन गई हैं.

हालांकि कई फ़िल्में अपने बेहतर निर्देशन और अभिनय की वजह से हिट भी रहीं। और उन्होंने बॉक्स ऑफ़िस पर कई रिकार्ड बनाए। उन्हीं में एक थी 2019 में आई ‘उरी: द सर्जिकल स्ट्राइक’. फ़िल्म में सर्जिकल स्ट्राइक की घटना का उल्लेख है और यह राष्ट्रवाद को केंद्र में रखती है.

अब इसी तरह सुपर हिट की फ़िल्म की श्रेणी में आ गई है– ‘छावा’। ‘छावा’ एक मराठी शब्द है जिसका अर्थ होता है ‘शेर का बच्चा’ या ‘शेर का बेटा’, मराठा संस्कृति में ‘छावा’ विशेष रूप से योद्धा और वीर पुत्र के रूप में संदर्भित होता है.

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