संस्कारों का पतन ही राष्ट्र की मृत्यु है: विशेष आलेख

गोरखपुर हलचल

कभी यह वही भारत था जहाँ द्रौपदी के वस्त्रहरण पर सभ्यता का सिर झुक गया था,
और एक स्त्री की लज्जा भंग करने की कोशिश ने महाभारत जैसी भीषण युद्धगाथा को जन्म दिया था.

पर आज? आज वही भारत है जहाँ स्त्रियाँ स्वयं अपनी लज्जा के वस्त्र “फ़ैशन” और “आधुनिकता” के नाम पर उतार रही हैं, और समाज उसे ग्लैमर कहकर ताली बजा रहा है.

यह वही देश है जहाँ मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने स्त्री के सम्मान के लिए राज–सिंहासन तक त्याग दिया था, पर आज उसी राम के देश में मर्यादा अब एक मीम बनकर रह गई है.

जहाँ कभी पंडित किसी स्त्री को तिलक लगाने से भी हिचकते थे, वहाँ अब विवाह जैसे पवित्र अवसरों पर साड़ी पहनाने,

ब्लाउज फिट करने, मेकअप करने और टैटू बनाने तक के कार्य पुरुष कर रहे हैं.
दुख इस बात का नहीं कि यह सब हो रहा है,

बल्कि इस बात का है कि समाज इसे प्रगति समझकर गर्व महसूस कर रहा है. कभी माँ–बहनों के चरण धोकर पुत्र देवता बनते थे,

अब वही पुत्र जिम और सैलून में खड़े होकर अर्धनग्न महिलाओं की देह छूने को “प्रोफेशन” मानते हैं.

वह भी उन्हीं परिवारों से निकलते हैं जहाँ संस्कारों की बात करने पर कहा जाता है कि “अरे, अब ज़माना बदल गया है!”

पर सच यह है कि ज़माना नहीं बदला-ज़मीर मर गया है. जिस समाज में लज्जा मनोरंजन बन जाए, जहाँ देह संस्कृति से ऊपर चली जाए,

जहाँ स्त्रीत्व का गौरव बाज़ार में बिके, वहाँ सभ्यता का सूर्य अस्त हो जाता है. यह वही भारत है जिसने कहा था –

“यत्र नार्यस्तु पूज्यन्ते रमन्ते तत्र देवता” आज वही देवता पलायन कर गए हैं, क्योंकि पूजन अब देह का हो रहा है, देवीत्व का नहीं.

मनुष्य तब नहीं मरता जब उसकी साँस रुकती है, वह तब मरता है जब उसकी शर्म, संकोच और संस्कार मर जाते हैं.

आज हमारे घरों में माता–पिता धर्मग्रंथ नहीं, ‘रिल्स’ और ‘रैम्पवॉक’ देखकर अपने बच्चों को आधुनिकता सिखा रहे हैं.

पर याद रखिए-जिस दिन संस्कारों की जड़ें सूख जाएँगी, उस दिन समाज तो बचेगा, पर धर्म नहीं बचेगा. संस्कार ही भारत की आत्मा हैं और आत्मा का पतन ही राष्ट्र की मृत्यु है.

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