आज से 77 साल पहले जब देश को आजादी मिली थी तब भारत की हालत ऐसी थी कि यहां के लोगों को पेट भर अनाज नहीं मिल पाता था. भारत के लोग अमेरिका से मिलने वाले गेहूं और मोटे अन्न पर निर्भर थे.
अनाज की कमी से उपजी भुखमरी के कारण हर साल देश के लाखों लोग असमय काल के गाल में समा रहे थे. नई-नई महामारियां पैदा हो रही थीं.
भारत में पैदा होने वाले आधे से अधिक बच्चे कुपोषित होने लगे. ये भारत के भविष्य के लिए बेहद खतरनाक स्थिति थी. देश को ऐसी मुश्किल परिस्थितियों से निकालने के लिए प्रधानमंत्री नेहरू जी चिंतित थे.
वे दुनिया के कई देशों से भारत को खाद्यान्न में आत्मनिर्भर बनाने के लिए मदद का आग्रह किया. मगर ज्यादातर लोगों ने इसे अनसुना कर दिया.
नेहरू को ये बात खटकी जरूर मगर उन्होंने ये प्रण किया कि अपने कार्यकाल में ही भारत को इतना मजबूत बनाएंगे कि अनाज के लिए किसी के आगे हाथ न पसारना पड़े.
इसी दिशा में कार्य करते हुए काफी सोच विचार और वैज्ञानिक विश्लेषण करने के बाद साल 1960 में नेहरू जी ने देश में उन्नत कृषि की दिशा में नए शोध और प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए
उत्तराखंड के पंतनगर में देश के पहले कृषि विश्विद्यालय की स्थापना की. इसी के बाद देश में हरित क्रांति की नींव पड़ी. अपनी स्थापना के कुछ ही साल बाद इस संस्थान ने
धान, गेहूं, दलहन और तिलहन की ऐसी प्रजातियां विकसित की, जो कम पानी, खाद और लागत में ज्यादा से ज्यादा उत्पादन देने की क्षमता रखती थी.
नतीजा ये हुआ कि 1960 तक पेट भरने के लिए हताश रहे देश में सिर्फ 10 सालों के भीतर ही हर व्यक्ति को पोषण युक्त भोजन मिलने लगा.
यहां पर विकसित की गई अनाज फसलों, सब्जियों एवं फलों की विभिन्न प्रजातियां और अनेक उन्नत कृषि तकनीकें आज पूरे भारत का पेट भर रही हैं, 140 करोड़ देशवासियों का अच्छी तरह से पोषण कर रही हैं.
जो लोग पूछते हैं कि नेहरू ने क्या किया, उन्हें ये बताइये कि आज उनका पेट नेहरू के ही कारण भर रहा है. तभी बड़ी-बड़ी बातें कर पा रहे हैं, वर्ना आजादी के वक्त BJP की सरकार बनती या मोदी प्रधानमंत्री बनते तो आज भी भारत दूसरों के आगे हाथ फैला रहा होता.
(B-ARVIND KUMAR SINGH, PRKS)

