शुक्र है बापू, तुम ना हुए
एक तो 30 जनवरी की तारीख के बावजूद, तीस जनवरी वाली कोई बात नहीं थी। न मुकर्रर वक्त पर साइरन के जरिए पुकार और न जगह-जगह लाउडस्पीकरों से ‘‘दे दी हमें आजादी बिना खड्ग बिना ढाल, साबरमती के संत तूने कर दिया कमाल’’ की गुहारें
गांधी शहादत दिवस पर संविधान की पुकार: “मुझे केवल संविधान चाहिए और कुछ नहीं”
गांधी शहादत दिवस यानि 30 जनवरी भारत के लोकतांत्रिक इतिहास में केवल श्रद्धांजलि का नहीं, बल्कि आत्ममंथन का दिन है। यह वही देश है जिसकी बुनियाद गांधी, अंबेडकर, नेहरू, पटेल, सुभाष चंद्र बोस, भगत सिंह, अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ, पंडित बिस्मिल और चंद्रशेखर आज़ाद ने रखी थी। आज उसी भारत में संविधान की आत्मा कराह रही है। पूर्वांचल गांधी डॉ संपूर्णानंद मल्ल ने राष्ट्रपति मुर्मू को पत्र के जरिए बताया कि भगत सिंह ने कहा था— “मुझे केवल संविधान चाहिए और कुछ नहीं”। जस्टिस मार्कंडेय काटजू ने चेताया— “यहाँ रिवॉल्यूशन चाहिए”। ये कथन आज के भारत में और अधिक प्रासंगिक हो गए हैं, जहाँ सत्ता के संरक्षण में नफरत को नीति बनाया जा रहा है।
सत्ता उन्माद और संविधान की मूल भावना का उल्लंघन
आज देश में जो कुछ भी घटित हो रहा है, उसकी नैतिक और संवैधानिक जिम्मेदारी प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार पर आती है। राज्य सरकारें खुलेआम संविधान की मूल भावना— धर्मनिरपेक्षता, समानता और बंधुत्व— को रौंदती दिखाई दे रही हैं। इतिहास गवाह है कि जब-जब सत्ता उन्माद में बदली, तब-तब धार्मिक स्थलों को निशाना बनाया गया। जैसे ब्राह्मण आतंकियों द्वारा बौद्ध विहार तोड़े गए, बौद्ध भिक्षुओं की हत्या हुई; जैसे मुस्लिम आक्रांताओं ने मंदिर तोड़े और नरसंहार किए; उसी ऐतिहासिक अन्याय की पुनरावृत्ति आज उत्तराखंड में हो रही है, जहाँ मुख्यमंत्री पुष्कर सिंह धामी के शासन में मस्जिदों को तोड़ा जा रहा है। यह कृत्य न कानून सम्मत है, न नैतिक और न ही संवैधानिक।
इसी प्रकार असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा लगातार मुसलमानों के विरुद्ध जहर उगल रहे हैं। उन्हें बांग्लादेश भेजने की धमकियाँ दी जा रही हैं। हमें कतई नहीं भूलना चाहिए कि ऐसे बयान न केवल अल्पसंख्यकों को असुरक्षित बनाते हैं बल्कि भारत की संवैधानिक एकता को सीधी चुनौती दे रहे हैं। मेरा आपसे सीधा और संवैधानिक प्रश्न है—क्या उत्तराखंड के सीएम पुष्कर सिंह धामी और असम के मुख्यमंत्री हेमंत विश्व शर्मा का यह आचरण संवैधानिक है या असंवैधानिक? अब यह पूछने की जरूरत है कि क्या उत्तराखंड और असम के राज्यपालों ने इन्हें संविधान की रक्षा की शपथ दिलाई थी या संविधान के हत्या की?
सीमावर्ती राज्यों में नफरत का खतरा: देश की एकता पर प्रहार
ये दोनों राज्य सीमावर्ती हैं। ऐसे राज्यों में सत्ता द्वारा नफरत फैलाना, देश की आंतरिक सुरक्षा, एकता और अखंडता के लिए अत्यंत घातक है। सामने से संविधान की हत्या की जा रही है—और यह हत्या केवल अल्पसंख्यकों की नहीं, बल्कि पूरे भारत की है। भारत संविधान से चलता है। यह देश किसी एक धर्म, एक पार्टी या एक विचारधारा का नहीं है। यह गांधी का भारत है,
अंबेडकर का भारत है, भगत सिंह और अशफ़ाक़उल्ला ख़ाँ का भारत है।
इसीलिए मैं आपसे विनम्र लेकिन दृढ़ निवेदन करता हूँ— इन दोनों मुख्यमंत्रियों को पद से हटाया जाए या उत्तराखंड और
असम में राष्ट्रपति शासन लगाया जाए। मेरे पत्रों को पढ़ा जाए,
रिकॉर्ड में दर्ज करके जवाब दिया जाए। संविधान की हिफाजत की जाए। सेक्युलरिज़्म—
जो गांधी, भगत सिंह, सुभाष, अशफ़ाक़उल्ला, पंडित बिस्मिल, चंद्रशेखर आज़ाद और
डॉ. अंबेडकर के संविधान का मूल ढांचा है—उसे बचाया जाए।
व्यक्तिगत पीड़ा और सत्याग्रह की विवशता
मैं अस्वस्थ हूँ। 25 दिसंबर से मेरा रक्तचाप बढ़ा हुआ है।
चर्च के सामने हनुमान चालीसा पढ़ते देख मैं असहज हूँ।
मैं यकीन नहीं कर पा रहा हूं कि यह वही भारत है।
संसद के सामने सत्याग्रह के लिए मैं विवश हो चुका हूँ।
गांधी शहादत दिवस पर यह पुकार संविधान की रक्षा के लिए है, जो भारत की आत्मा है।
हमें मिलकर इसकी हिफाजत करनी होगी, ताकि आने वाली पीढ़ियां एक एकजुट, सेक्युलर और समान
भारत में सांस ले सकें। यह केवल एक अपील नहीं, बल्कि लोकतंत्र की रक्षा का आह्वान है

