अगर आप आस्तिक हैं और मंदिर में पूजा करने जाते हैं तो देवी-देवताओं को “सुमन” नहीं “श्रद्धा-सुमन” ही चढ़ाइए। क्योंकि जो सुमन आप बाजार से खरीदते हैं वह आपके हाथ आने से पहले ही कई जन्मों का व्यापारिक पुनर्जन्म ले चुका होता है।
मंदिर के बाहर सजी फूल-माला की दुकानों को देखकर लगता है जैसे भक्ति का मेला लगा हो, लेकिन जरा परदा हटाइए तो पता चलता है कि यह भक्ति कम, बिजनेस ज्यादा है।
श्रद्धालु बड़ी आस्था से माला खरीदते हैं, भगवान के गले में चढ़ाते हैं और मन में सोचते हैं कि उनकी भक्ति सीधे स्वर्ग की फाइल में दर्ज हो गई।
उधर भगवान के गले से माला उतरती है, थोड़ी देर विश्राम करती है और फिर दुकान पर पुनर्जन्म लेकर वापस बिक्री के लिए सज जाती है।
फिर कोई दूसरा भक्त आता है, वही माला खरीदता है फिर भगवान को चढ़ाता है और फिर वही माला वापस दुकान पर…इस तरह मंदिरों में भक्ति कम और “मालाओं की रिले रेस” ज्यादा चल रही है।
“माला चक्र” की जानकारी दुकानदार को भी है, पंडा-पुजारी को भी है और शायद भगवान को भी। फर्क बस इतना है कि भक्त पुण्य कमाने आता है और दुकानदार धन कमाने।
“फूल” की कमाई में “हाफ” पंडा-पुजारी का भी है। यही कारण है कि पाप की कमाई भी पुण्य प्राप्ति का साधन बनी हुई है। चैत्र नवरात्रि और शारदीय नवरात्रि आते ही यह धंधा अपने नौ दिन के स्वर्णिम युग में पहुंच जाता है।
मंदिरों में भक्ति की कतार लगती है और दुकानों में नकदी की आरती उतरती है। अजीब विडंबना है, भगवान के चरणों में चढ़ने वाला फूल भक्त के मन को “पवित्र” करने के बजाय कुछ लोगों की जेब को “समृद्ध” कर रहा है।
इसलिए अगली बार जब आप मंदिर जाएं तो “सुमन” के बजाय “श्रद्धासुमन” चढ़ाएं, क्योंकि आजकल मंदिरों में फूल नहीं, “फूल का कारोबार” चढ़ाया जा रहा है।
सच्चाई यही है कि भगवान के गले की माला, कुछ लोगों को “मालामाल” कर रही है और बाहर खड़े लाला रोज़ उसका हिसाब लगा रहे हैं। भक्ति की थाली में अब आस्था कम और “मालाचक्र” का प्रसाद ज्यादा परोसा जा रहा है।
(@ गंवार….महेंद्र गौड़ की कलम से)


