नफरती एजेंडे की बलिवेदी पर चढ़ा कुंभ का मेला: बादल सरोज (PART-2)

gorakhpur halchal

इतनी विराट संख्या में लोगों के जमा होने के चलते प्रबंधन और नियोजन में हुकूमतों और सरकारों की भूमिका अकबर के समय से शुरू होने के दस्तावेजी प्रमाण मौजूद हैं, जिन्हें संघी कुनबे के इतिहासकार भी मानते हैं.

यह अकबर थे, जिन्होंने कुंभ की सहूलियत के लिए सार्वजनिक शौचालय और घाटों के निर्माण किये तथा दो अधिकारी इस मेले के इंतजाम के लिए नियुक्त किये.

इनमें से एक मीर ए बहर था जो जमीन, पानी और साफ-सफाई की व्यवस्था देखता था और दूसरा मुसद्दी हुआ करता था, जिसके जिम्मे घाटों की जिम्मेदारी हुआ करती थी.

अकबर ने इस मेले के लिए राजकोष से भी रकम का प्रबंध किया था. उन्होंने धार्मिक, दार्शनिक बहसों और चर्चाओं के लिए स्थान और परिसर भी बनवाये.

यह परम्परा अंग्रेजों ने भी जारी रखी और 1857 के बाद इन व्यवस्थाओं का रखरखाव कर इनमें इजाफा किया. आजादी के बाद की सरकार ने भी भीड़ नियंत्रण और उसके अनुरूप इंतजाम न सिर्फ जारी रखे, बल्कि 1954 के बजट में बाकायदा 1 करोड़, 10 लाख रूपये का आबंटन आधारभूत मौलिक सुविधाओं के लिए किया.

कुंभ के इतिहास के गहरे कुंड से उठाई बूंदों का यह आचमन आज इस एतिहासिक मेले के कुटिल राजनीतिक इरादों और साम्प्रदायिक, विभाजनकारी, संकीर्ण एजेंडे के लिए किये जाने वाले दुरुपयोग को समझने में मददगार होगा.

इसलिए भी जरूरी है क्योंकि इस 2025 के महाकुंभ में कुंभ की इस मूल भावना का ही तर्पण कर दिया गया है. परम्पराओं की निरंतरता या नियमितीकरण करने की बजाय उनका भौंड़ा विकृतीकरण किया जा रहा है.

मेले सहित पूरे प्रयागराज और उसकी तरफ जाने वाले बीसियों किलोमीटर के मार्गों में जित देखूं तित प्रचारजीवी मोदी और योगी की तस्वीरों वाले बड़े-बड़े होर्डिंग्स टंगे हुए है.

अखबारी विज्ञापनों सहित सारी सामग्री में भी यही दोनों हैं. मगर मामला सिर्फ प्रचार लिप्सा तक सीमित नहीं है, एक अनूठी पहचान वाले मेले के साथ भी कुनबा वही सलूक कर रहा है, जो इसने धर्म के साथ किया है;

इसे भी विकृत और दूषित करके नफ़रत फैलाने और साम्प्रदायिक उन्माद का जरिया बनाया जा रहा है. इसकी शुरुआत मेला भरने से पहले ही अखाड़ा परिषद् के अध्यक्ष रवींद्र पुरी ने कर दी थी.

मोदी के हाथ मजबूत करके हिन्दुत्व की फौलादी एकता की दुहाई देने, सभी विपक्षी दलों को हिन्दू विरोधी बताने, भागवत के चार बच्चे पैदा करने के बयान को सही करार देने,

सभी पुरानी मस्जिदों को मन्दिर में बदलने और शाही स्नान में से शाही शब्द हटाने जैसे राजनीतिक बयान देने वाले ये पुरी साहब अखाड़ा परिषद् का विघटन और विग्रह करके जोड़-तोड़ और सत्ता तथा संघ की मदद से बने अध्यक्ष हैं.

कुंभ के ठीक पहले तीन फाड़ हुयी इस अखाड़ा परिषद् की धार्मिकता और आध्यात्मिकता कितनी मजबूत है, इसका उदाहरण खुद सीएम योगी की अध्यक्षता में हुई इसकी बैठक में हुई जूतमपैजार और एक दूसरे का लतभंजन करने के पावन कृत्य और उसकी पुलिस थानों में लिखाई गयी अनेक एफआईआर से जाहिर हो गया था.

तनातनी सिद्धहस्त इस ‘सच्चे सनातनी’ रविन्द्र पुरी ने एलान किया कि मेले में जब दुकानों का आबंटन किया जाए, तो सख्ती के साथ यह प्रावधान किया जाए कि किसी भी मुसलमान को दूकान नहीं दी जाए.

इसके बाद तो इस बेसुरे सुर को और बेसुरा बनाने के लिए राजनिष्ठ और संघनिष्ठ महंतों, आचार्यों और स्वयम्भू शंकराचार्यों की लाइन-सी लग गयी. दुकानें न देने से शुरू हुई मुहिम मेले में मुसलमानों के प्रवेश को

प्रतिबंधित किये जाने से होती हुई सभी गैर सनातनियों के आने पर रोक की मांग तक पहुंच गयी और इसमें कैलाश विजयवर्गीय से लेकर संगीत सोम जैसे भाजपा नेता भी ताल से ताल मिलाने कूद पड़े.

संविधान की शपथ लेकर इस वर्ष के कुंभ वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री भी गर्म किये जा रहे कड़ाह में छौंका लगाने उतरे और इस मुस्लिम विरोधी मसाले में तड़का मारते हुए हिन्दू समुदाय के बाकी पंथों को भी लपेट लिया.

कुंभ मेले के एफ एम रेडियो का उदघाटन करते समय उन्होंने कहा कि “सनातन पर उंगली उठाने वाले लोग यहाँ न आयें, तभी अच्छा रहेगा जो अपने आपको भारतीय मानता है और सनातन परम्परा के प्रति श्रद्धा का भाव रखता है, वह जरूर आये.

मजेदार बात यह है कि खुद योगी आदित्यनाथ उस नाथ सम्प्रदाय के सबसे बड़े मठ के मठाधीश है, जो अपने मूल से ही ब्राह्मण पंथों, वैष्णव सनातन पंथ का विरोधी रहा है.

नाथ पंथ का प्रभाव मूलतः छोटी दलित जातियों जैसे जोगी, कोल, संपेरा, सरवन, बुनकर, रंगरेज इत्यादि में रहा है. आज भी अनेक छोटी दलित जातियां नाथ पंथ से जुड़ी हैं, भले इसके मठाधीश आदित्यनाथ चोला बदल के हों.

बहरहाल योगी की बात को और ज्यादा साफ-साफ़ शब्दों में ज्योतिर्मठ पीठ के शंकराचार्य अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने बोला और आर्य समाजियों को हिदायत दे दी कि वे कुंभ में न आयें.

हालांकि ऐसा करते समय भी धंधे का भान और कारपोरेट का मान ध्यान में रखा गया. ठेले, खोमचे और स्टॉल लगाने वाले भारतीयों पर बमकते रहे, किन्तु स्टीव जॉब्स की एप्पल इंक और अरबों डॉलर की मालकिन लोरेन पावेल जॉब्स के आने पर खुशियां मनाई जाती रहीं.

आसाराम जैसे बलात्कारी और यौन दुराचारियों के पंडाल सजाने के लिए महत्वपूर्ण लोकेशन पर जगहें दी जा रही हैं और सेवा संस्थान द्वारा पूर्व मुख्यमंत्री मुलायम सिंह की तीन फूट की मूर्ति लगाए जाने पर कोहराम मचाया जा रहा है.

सकल ब्रह्माण्ड में सिर्फ दो–अलौकिक जगत में कृष्ण और लौकिक जगत में स्वयं को नॉन बायोलॉजिकल बताने वाले नरेंद्र मोदी – को अपना मित्र बताने वाले खुद की बनाई पीठ के खुद ही पीठाचार्य बने रामभद्राचार्य और भी दूर निकल लिए.

कुंभ आये ये पीठाचार्य अब कुम्भन दास जैसे संत कवि तो हैं नहीं, जो “संतन को कहा सीकरी सो काम, आवत जात पन्हैया टूटी बिसर गयो हरिनाम” को कहें या माने.

उनकी तो चाहत ही सीकरी का महात्म्य और सीकरी में बैठने वाले का चालीसा गाने की है, सो स्नानों और डुबकियों के लिए होने वाले पौराणिक कुंभ में भी उन्होंने पाकिस्तान को लाकर प्राण प्रतिष्ठित कर दिया.

बाकी लोग महीने भर अलग-अलग तरह के गंगा स्नान करेंगे, किन्तु रामभद्राचार्य 251 कुण्डीय यज्ञ करके उसमें 1 करोड़, 51 लाख आहुतियाँ देकर मंत्रोच्चार की शक्ति से पीओके–पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर–को भारत में शामिल कर लेंगे.

विश्व राजनीति में सीमा विवादों का इस तरह से समाधान और अनाधिकृत कब्जों की वापसी का निराकरण इससे पहले शायद ही किसी के विचार में आया होगा, जो इन्होने खोज निकाला है.

न चित्रकूट की सैकड़ों एकड़ जमीन पर अनधिकृत आश्रम पसारे बैठे रामभद्राचार्य को पाकिस्तान से कोई मतलब है, ना देश की बीफ बेचने वाली बड़ी दुकानों में से एक के मालिक संगीत सोम को किसी धर्म की ही परवाह है.

इनका और इन जैसों का एकमात्र मकसद किसी न किसी बहाने हिन्दू-मुसलमान करके नफरती एजेंडे को बढ़ाना है – जो इधर वे इस तरह के शोशे उछालकर कर रहे हैं, तो उधर उनका पालतू मीडिया कभी

किसी कथित खालिस्तानी आतंकी, तो कभी गुमनाम चिट्ठियों में मिली बताई गयी बम धमाकों की धमकियों की अफवाहें फैलाकर किये हुए है. हैरत की बात यह है कि इन कथित धर्म ध्वजाधारियों और मीडिया,

किसी ने भी आगरा के एक पेठा व्यवसायी द्वारा अपनी 13 वर्ष की बच्ची को एक साधु को ‘दान’ दिए जाने पर अंगुली नहीं उठाई. देवदासी की कुत्सित और कलंकित प्रथा को कुंभ जैसी जगह अमल में लाने पर आपत्ति नहीं की.

जनता में उपजे क्षोभ को देखते हुए संबंधित ‘साधू’ के जूनी अखाड़े ने उसे 7 वर्ष के लिए निष्कासित कर, लड़की को वापस लौटा कर अपनी झेंप मिटाई. इस प्रसंग ने एक बार फिर सबको दिखा दिया कि इन सनातनियों के बीच स्त्री की स्थिति क्या है?

यह भी सामने आ गया कि इन 14 अखाड़ों में आज भी महिलाओं के किसी भी अखाड़े को शामिल नहीं किया गया है. पौराणिक कथाओं के हिसाब से कुंभ मेले के लिए स्थानों का चयन समुद्र मंथन में निकले अमृत के कलश,

जिसे कुंभ भी कहा जाता है, से टपकी बूंदों के आधार पर किया गया था – कुनबा अब उन्हीं स्थानों को विष की थोक आपूर्ति का कुण्ड बनाने पर आमादा है.

इसके लिए उन सारी सीमा रेखाओं के उल्लंघन और अवहेलनाओं के लिए तत्पर है, जिनके दायरे में रहते हुए ही भारत एक संप्रभुता संपन्न धर्मनिरपेक्ष लोकतांत्रिक गणराज्य बना है.

इस मेले के पहले दिन 14 जनवरी को हुई महाआरती में भारतीय सेना के अधिकारियों की, उनकी निजी नहीं, आधिकारिक हैसियत से, भागीदारी इसका एक उदाहरण है.

🔵 महाकुंभ 2025 प्रयागराज-इलाहाबाद में गंगा के उसी संगम पर हो रहा है, जिस पर कोरोना आपदा के दौरान लाशों का महाकुंभ हुआ था – मुक्तिदायिनी गंगा शववाहिनी गंगा में बदल गयी थी.

बिना अंतिम संस्कार किये बहा दी गयीं सैकड़ों मृत देहें ठीक उसी जगह आकर ठिठक कर रुक गयीं थी, जिस जगह आज हजारों करोड़ रूपये फूंककर एक परम्परा का विकृत और साम्प्रदायिक राजनीतिकरण किया जा रहा है.

यूपी से ही लोकसभा सांसद चन्द्रशेखर रावण ने भी यही बात उठाई है. कुंभ मेले की चाक चौबंद व्यवस्था का हवाला देते हुए उन्होंने पूछा है कि यही प्रशासन और उसका तंत्र इसी तरह की व्यवस्थित मुस्तैदी गरीबों और दलितों की शिक्षा और स्वास्थ्य के मामले में क्यों नहीं उठाता.?

इतना सारा धन ऐसे मेलों पर फूंक दिया जाता है और उसी गंगा में बिन जले शवों के ढेर सड़ते रहते हैं. उन्होंने खर्च और ऊर्जा दोनों की प्राथमिकता पर सवाल उठाये हैं और इन पर विचार की आवश्यकता बताई है.

ध्यान रहे कि योगी और मोदी की सरकारों ने इस मेले के लिए कोई 7 हजार करोड़ रूपयों का प्रत्यक्ष आबंटन किया है, अन्य विभागों और इंतजामों में किया जा रहा खर्चा इससे अलग है और किसी भी हालत में इससे दोगुने से कम नहीं है.

इस सबसे ध्यान हटाने के लिए, खुद को पढ़ा-लिखा और समझदार मानने वाले मध्यमवर्ग को बहलाने के लिए एक शिगूफा इस मेले को डिजिटल महाकुंभ बताने का छोड़ा गया है.

इस डिजिटल में क्या, कैसा और कितना डिजिटल होने वाला है, यह तो शिगूफेबाजों को भी नहीं पता, अलबत्ता ब्रोशर में उनके द्वारा दी गयी जानकारी में दावा किया गया है कि इस बार कुंभ के मेले में बिछड़ने की कहावत को सुधारा जाएगा–

खोये लोगों को डिजिटली खोजा जाएगा और उसी तरह पाया भी जा सकेगा. मुमकिन है, इस तरह कुछ खोये हुओं को ढूंढ लिया जाए, मगर इस सबके बीच जो कुंभ खो गया है, उसे कैसे ढूंढा जाएगा?

मेलों में मेल-मिलाप, उत्सव और उल्लास की जो परम्परा रही है, वह खो गयी है, उसे खोजने में न जाने कितने कुंभ लगेंगे। शायद उतने ही जितने किसी भीड़ को जलूस में बदलने में लगते है!!

(नोट: यह आलेख डॉ. अम्बेडकर, ओशो सहित अन्य बुक स्टाल्स पर कल हुए हमले के पहले लिखा गया है)

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