पश्चिम एशिया युद्ध का भारत पर सीधा असर: व्यावसायिक एलपीजी आपूर्ति ठप
पश्चिम एशिया में जारी युद्ध ने भारत की ऊर्जा आपूर्ति को बुरी तरह प्रभावित किया है। खासकर व्यावसायिक एलपीजी (कमर्शियल LPG) सिलेंडरों की सप्लाई पर गहरा संकट मंडरा रहा है। सरकार ने घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता देते हुए व्यावसायिक उपयोग के लिए सिलेंडरों की आपूर्ति रोक दी है या काफी कम कर दी है। इससे छोटे-बड़े होटल, रेस्तरां, ढाबे और स्ट्रीट फूड वेंडरों पर भारी संकट गहरा गया है।
48 घंटे का समय बचा: अधिकांश प्रतिष्ठान बंद होने की आशंका
संचालकों का कहना है कि उनके पास अब सिर्फ 48 घंटे का स्टॉक बचा है। अगर आपूर्ति जल्द बहाल नहीं हुई तो अगले दो दिनों में अधिकांश छोटे होटल और रेस्तरां बंद हो सकते हैं। ठेला, स्टॉल और हलवाई दुकानों को भी तगड़ा झटका लगेगा, क्योंकि ये कमर्शियल सिलेंडरों पर ही निर्भर हैं। होटल एंड रेस्तरां एसोसिएशन के अध्यक्ष राकेश चौहान ने बताया कि जिले में 900 से अधिक होटल-रेस्तरां हैं, जबकि 8000 से अधिक स्टॉल, ठेल और हलवाई की दुकानें संचालित हैं।
गैस एजेंसियों से मिल रही सिर्फ 50% सप्लाई
व्यावसायिक सिलेंडर की कटौती के बाद गैस एजेंसियों से संपर्क करने पर भी सिर्फ 50 फीसदी से कम सिलेंडर मिल पा रहे हैं। कई जगहों पर ब्लैक मार्केटिंग की शिकायतें आ रही हैं, जहां सिलेंडर की कीमतें कई गुना बढ़ गई हैं। देशभर के बड़े शहरों जैसे मुंबई, बेंगलुरु, चेन्नई, कोलकाता और हैदराबाद में स्थिति और गंभीर है। मुंबई में 20% से अधिक होटल पहले ही बंद हो चुके हैं, और अगर संकट जारी रहा तो 50% तक पहुंच सकता है।
कारण: युद्ध से प्रभावित वैश्विक सप्लाई चेन
पश्चिम एशिया (मुख्य रूप से ईरान से जुड़े संघर्ष) में युद्ध के कारण स्ट्रेट ऑफ होर्मुज जैसे महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग प्रभावित हुए हैं। भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा एलपीजी आयातक है, और 85-90% आयात इसी क्षेत्र से होता है। युद्ध ने शिपिंग ट्रैफिक रोक दिया, जिससे वैश्विक स्तर पर एलपीजी की कमी हो गई। भारत सरकार ने इमरजेंसी पावर का इस्तेमाल कर रिफाइनरियों को घरेलू सप्लाई बढ़ाने के निर्देश दिए, लेकिन व्यावसायिक सेक्टर पर इसका बोझ पड़ गया।
प्रभाव: छोटे व्यवसायों पर सबसे ज्यादा असर
छोटे होटल-रेस्तरां और स्ट्रीट वेंडर सबसे ज्यादा प्रभावित हैं, क्योंकि उनके पास वैकल्पिक ईंधन जैसे बिजली या
कोयल का विकल्प सीमित है। कई जगहों पर मेन्यू में कटौती हो रही है
, सिर्फ कम गैस वाले व्यंजन बनाए जा रहे हैं।
ठेला संचालकों को रोजगार पर खतरा मंडरा रहा है। यह संकट न सिर्फ फूड इंडस्ट्री को
प्रभावित कर रहा है, बल्कि लाखों लोगों की आजीविका पर भी असर डाल रहा है।
सरकार की ओर से क्या कदम?
सरकार ने ग्रिवांस रिड्रेस कमिटी बनाई है और उत्पादन बढ़ाने के प्रयास कर रही है।
कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया है कि घरेलू सप्लाई को प्राथमिकता
देने से व्यावसायिक सेक्टर को राहत मिल सकती है, लेकिन फिलहाल स्थिति गंभीर बनी हुई है।
यह संकट भारत की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा सवाल खड़ा करता है।
अगर युद्ध लंबा खिंचा तो ऐसे संकट बार-बार आ सकते हैं।
छोटे व्यवसायों को तत्काल राहत की जरूरत है, वरना फूड सेक्टर में बड़े पैमाने पर बंदी हो सकती है।


