जब बिना किसी सुविचारित नीति के चुनाव को नजर में रखकर युद्धोन्माद फैलाया जाता है और फिर जनता को संतुष्ट करने और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को मजबूत करने के लिए युद्ध की ‘रचना’ की जाती है, तो उसका वही हश्र होता है, जो कल हमें दिखा.
पहलगाम में आतंकी हमले के बाद पूरे देश में युद्ध और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का जो वातावरण बनाया गया, उसमें पाकिस्तान पर ‘सीमित हमला’ करना जरूरी था, वरना भाजपा के घरेलू चुनाव के मोर्चे पर मात खाने की उम्मीद बन रही थी.
गोदी मीडिया द्वारा इस सीमित हमले को इस तरह दिखाया गया कि अब दुनिया के नक्शे से पाकिस्तान का नाम ही मिटने वाला है और पाक हुक्मरान दया की भीख मांग रहे हैं.
मीडिया ने कराची और पेशावर तक चढ़ाई कर दी थी कि अमेरिका ने युद्ध विराम का फैसला सुना दिया और भारत ने उसे एक अच्छे बच्चे की तरह मान लिया.
लेकिन फिर खबर आई कि पाकिस्तान ने अमेरिका-प्रायोजित इस युद्ध विराम का भी उल्लंघन कर दिया है. सेना की सर्वोच्च अधिकारी राष्ट्रपति मौन है, प्रधानमंत्री आम जनता से नजरें चुरा रहे हैं.
उधर पाकिस्तानी हुक्मरान संसद से मुखातिब है और वहां भारत की हार का जश्न मनाया जा रहा है. कश्मीर का जो मामला वर्ष 1971 के बाद से आज तक द्विपक्षीय बना हुआ था, अब उसके अंतर्राष्ट्रीय बनने की संभावना बलवती हो गई है.
भारत-पाक के किसी युद्ध में या झड़प में भारत की ऐसी हास्यास्पद स्थिति कभी नहीं हुई, जैसी आज हो रही है. आम जनता यह सवाल पूछ रही है कि आखिर इस युद्ध से भारत को क्या हासिल हुआ?
असली सवाल यही है कि इस सीमित युद्ध से और जब पाकिस्तान पर भारत हर दृष्टि से हावी था, युद्धविराम करके भारत को हासिल क्या हुआ? भारत को हासिल क्या हुआ, यह सवाल पहली बार नहीं पूछा जा रहा है?
उस समय भी पूछा गया था, जब नोटबंदी की गई थी. तब बताया गया था कि इससे आतंकवाद की कमर टूट जाएगी, पता चल रहा है कि नोटबंदी के बाद आतंकवाद और मजबूत हो गया है कि हमारी ही कमर तोड़ रहा है.
जब कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म करके उसे टुकड़ों में बांटा गया, तब भी यही कहा गया कि इससे आतंकवाद खत्म हो जाएगा, लेकिन आतंकी हमले रुके नहीं.
इस आतंकी हमले ने पहलगाम में कश्मीरियों पर भी हमला किया, उनकी भी शहादतें लीं. पाक-प्रायोजित आतंकियों ने पर्यटकों का धर्म पूछकर उन्हें मारा, ताकि आतंकवाद के धर्म को दिखाया जा सकें,
लेकिन कश्मीर की हिंदू-मुस्लिम जनता ने एकजुटता के साथ यह दिखा दिया कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता. आतंक केवल आतंक होता है, बस!
इसलिए आम जनता यह सवाल पूछ रही है कि आखिर इस युद्ध से भारत को क्या हासिल हुआ? यह सवाल जायज भी है, क्योंकि बिहार की धरती से हमारे प्रधानमंत्री ने कसम खाई थी कि “आतंकियों को मिट्टी में मिला देंगे.”
इस सीमित युद्ध के दौरान बताया जा रहा था कि आतंकियों के ठिकानों को नेस्तनाबूद किया जा रहा है, ताकि कोई इस देश में घुसकर आतंकी हरकत करने की हिम्मत न कर पाए.
पाकिस्तान में 40 से ज्यादा शिविर हैं, जहां आतंकवादियों को प्रशिक्षित किया जाता है, उन्हें पाला-पोसा जाता है. खबरों के अनुसार, 8-10 शिविर नष्ट हुए हैं बाकी को क्यों छोड़ दिया गया, किसके कहने पर छोड़ा गया, यह सब जानने का अधिकार जनता का नहीं है?
बचे हुए आतंकी शिविर क्या अमेरिका में आतंक फैलाने का काम करते हैं, जिससे निपटने की जिम्मेदारी अमेरिका पर छोड़ दी गई है? मोदी सरकार ने जिस सीमित लक्ष्य के साथ यह युद्ध छेड़ा था, उसे भी प्राप्त करने में असफल रही है.
यह हमारी युद्ध नीति की भी असफलता है और कूटनीति की भी और यह असफलता क्यों हैं? इसलिए कि घरेलू मोर्चे पर मोदी सरकार आजादी के बाद की सबसे ज्यादा असफल सरकार साबित हुई है,
जिसने घरेलू समस्याओं को हल करने के बजाए, आम जनता का ध्यान इससे हटाने के लिए हर मौके पर विभाजनकारी नीतियां अपनाई और लगातार सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के जरिए चुनाव जीतने और सत्ता में बने रहने को अपना एकमात्र लक्ष्य बना लिया है.
देश विरोधी ताकतें भी इसका फायदा उठाने में लगी है, जो पहलगाम में आतंकी हमले से सही साबित होता है. ये ताकतें चाहती थी कि सांप्रदायिक आधार पर पहले से ही विभाजित भारतीय समाज और ज्यादा ध्रुवीकृत हो.
उन्हें इसमें कामयाबी भी मिली, जब प्रधानमंत्री कश्मीर जाने के बजाए, दो-दो सर्वदलीय बैठक में जाकर विचार-विमर्श करने के बजाए, बिहार जाकर इसे चुनावी मुद्दा बनाते हैं और संघी गिरोह पूरे देश भर में मुस्लिमों पर हमला करके हिंदुओं की शहादत का बदला लेता है.
(TO BE CONTINUED…)


