आंबेडकर जन मोर्चा के राष्ट्रिय अध्यक्ष श्रवण निराला ने अनेक राजनीतिक पार्टियों को निशाने पर लेते हुए बड़ा आरोप लगाकर कहा है कि
कलाकार रंगमंच की शान होते हैं, वे सब वहीं अच्छे लगते हैं. किन्तु आज भाजपा सहित अनेक राजनीतिक दल इनको राजनीतिक मंच देकर
राजनैतिक कार्यकर्ताओं का मनोबल तोड़ने की साजिश रच रहे हैं. वास्तव में राजनैतिक पार्टियों को नेता नहीं,
कार्यकर्ता नहीं, बल्कि गुलाम और रट्टू तोता चाहिए. सभी दल पार्टियों के कार्यकर्ता अपने नेतृत्व के सामने
सवाल खड़ा करके विरोध करें, वर्ना एक दिन ऐसा आएगा कि राजनीति को नाचने गाने वालों का मंच बना दिया जाएगा.
दरअसल यह लोकतन्त्र को समाप्त करने और संविधान का मजाक उड़ाने का एक बड़ी साजिश की जा रही है. ऐसे में समझने और जागने की जरूरत है.
भाजपा के साथ-साथ कई राजनैतिक पार्टियाँ लोकतन्त्र का मजाक उड़ा रही हैं. रविकिशन, मनोज तिवारी,
मैथिली ठाकुर, निरहुआ, खेसारी लाल यादव यह सब ताजा उदाहरण हैं. पहले कांग्रेस ने भी फिल्मी कलाकारों को आगे करके
देश के महान नेताओं को चुनाव हरवाया है. जैसे-अमिताभ बच्चन को इलाहाबाद से लड़ाया और एक बड़े नेता को चुनाव हरा दिया बाद मे उनकी मौत हो गई थी.
देश ने एक महान नेता गवां दिया. आज राजनीति के मंच पर कलाकार आते हैं तो कहीं छठ का गाना गाने लगते हैं तो कहीं संसद में
खड़ा होकर समोसा बेचने लगते हैं, क्योंकि इनके पास जनता के लिए कोई संवेदना नहीं है. यही हाल राजनीति में पूंजीपतियों के प्रवेश का भी है.
लोकतन्त्र का मजाक ना बनने दें इनका बहिष्कार करिये. याद रखिये मान्यवर कांशीराम साहब के पास भी बहुत फिल्मी कलाकार आये
और पैसे का प्रलोभन दिए थे किन्तु मान्यवर ने कभी किसी फिल्मी या अन्य कलाकारको चुनाव नही लड़ाया.
इसका मतलब यह नहीं है कि वो कलाकारों के विरोधी थे. सही मायने में कलाकार जिस कला में है, उसका सम्मान उस क्षेत्र में होना चाहिए.
चुनाव लड़ाकर, चटकदार गाना सुनाकर, तत्कालीक सुख दिखाकर, गरीबों की आवाज उठाने वाले राजनैतिक कार्यकर्ताओं के विचारों का दमन नहीं होना चाहिए.


