गोरखपुर में एम्स (AIIMS Gorakhpur) से जुड़ा एक बड़ा विवाद सामने आया है, जिसमें संस्थान के पूर्व कार्यकारी निदेशक (Executive Director – ईडी) प्रो. गोपाल कृष्ण पाल के बेटे के प्रवेश को लेकर सवाल उठे हैं। आरोप है कि बेटे ने प्रवेश तो ले लिया, लेकिन केवल दो दिन पढ़ाई की और उसके बाद गायब हो गए। इस मामले ने न सिर्फ एम्स प्रशासन को विवादों में घेरा बल्कि प्रो. पाल को भी पद से हटाने का कारण बना। आइए जानते हैं इस मामले की पूरी कहानी।
विवाद की शुरुआत: बेटे का प्रवेश और अनुपस्थिति
एम्स गोरखपुर के तत्कालीन ईडी प्रो. गोपाल कृष्ण पाल के बेटे को संस्थान में प्रवेश मिला। प्रवेश प्रक्रिया पूरी होने के बाद बेटे ने पढ़ाई शुरू भी की, लेकिन मात्र दो दिन कक्षाओं में उपस्थित रहने के बाद वे अचानक गायब हो गए। सूत्रों के अनुसार, बेटे की अनुपस्थिति लंबे समय तक जारी रही, जिससे प्रवेश प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे।
क्या यह प्रवेश नियमों के अनुरूप था? कई लोगों का मानना है कि ईडी होने के नाते प्रभाव का इस्तेमाल किया गया। प्रवेश के बाद इतनी जल्दी गायब होना संदेहास्पद लगता है। इस मामले ने एम्स के अंदरूनी नियमों और पारदर्शिता पर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया।
जांच और कार्रवाई: प्रो. पाल को हटाया गया
मामले की शिकायत मिलने के बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय ने गंभीरता से संज्ञान लिया। जांच के लिए एक विशेष कमेटी गठित की गई, जो प्रवेश प्रक्रिया, अनुपस्थिति और संभावित अनियमितताओं की पड़ताल कर रही है। जांच अभी जारी है, लेकिन इसी बीच प्रो. गोपाल कृष्ण पाल को उनके पद से हटा दिया गया।
उनका कार्यकाल 2 अक्टूबर को पूरा होने वाला था, लेकिन विवाद के चलते छह दिन पहले ही उन्हें हटा दिया गया। उनकी जगह एम्स भोपाल के प्रो. अजय सिंह को नया ईडी नियुक्त किया गया है।
प्रो. पाल को अब एम्स पटना में स्थानांतरित किया गया है। यह कार्रवाई विवाद की गंभीरता को दर्शाती है।
एम्स गोरखपुर में ऐसे विवाद क्यों बार-बार?
एम्स गोरखपुर एक प्रतिष्ठित संस्थान है, लेकिन पिछले कुछ समय से यहां प्रशासनिक विवाद सुर्खियों में रहे हैं।
इससे पहले पूर्व ईडी डॉ. सुरेखा किशोर को भी अचानक हटाया गया था।
अब प्रो. पाल का मामला सामने आने से संस्थान की विश्वसनीयता पर असर पड़ रहा है।
विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में पारदर्शिता जरूरी है।
प्रवेश प्रक्रिया में यदि रिश्तेदारों को फायदा पहुंचाया जाता है
तो यह अन्य योग्य छात्रों के साथ अन्याय है।
साथ ही, प्रवेश के बाद अनुपस्थिति और गायब होना जांच का विषय बनता है।
पुलिस या कानूनी कार्रवाई की स्थिति
फिलहाल इस मामले में कोई मुकदमा या एफआईआर दर्ज नहीं हुई है,
क्योंकि यह मुख्य रूप से प्रशासनिक अनियमितता का मामला लगता है।
हालांकि, यदि जांच में अनियमितता साबित होती है तो आगे कानूनी कार्रवाई हो सकती है।
बेटे के गायब होने का सटीक कारण अभी स्पष्ट नहीं है – क्या यह पढ़ाई का दबाव था या कुछ और?
निष्कर्ष: सबक और आगे की राह
यह मामला हमें याद दिलाता है कि सरकारी संस्थानों में पद का दुरुपयोग कितना खतरनाक हो सकता है।
योग्यता के आधार पर प्रवेश और नियमित उपस्थिति जरूरी है।
एम्स जैसे संस्थान स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण हैं, इसलिए यहां पारदर्शिता बनाए रखना आवश्यक है।
उम्मीद है कि जांच पूरी होने के बाद सच्चाई सामने आएगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी।
गोरखपुर और पूरे देश में ऐसे मामलों से सबक लेते हुए बेहतर सिस्टम बनाया जाए।

