अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस: औरत जब तक तंग रहेगी, जंग रहेगी, जंग रहेगी!

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गोरखपुर: ‘दिशा छात्र संगठन’ और ‘स्त्री मुक्ति लीग’ द्वारा गोरखपुर में 115 वें ‘अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस’ (8 मार्च) की पूर्व संध्या पर आज गोरखपुर विश्वविद्यालय के गेट पर पोस्टर प्रदर्शनी का आयोजन किया गया.

इस दौरान 8 मार्च के अवसर पर निकाले गये पर्चे का वितरण किया गया. पोस्टर प्रदर्शनी में प्रीति लता बाडेदार, दुर्गा भाभी, सावित्रीबाई फुले, क्लारा जेटकिन, रोजा लक्ज़ेम्बर्ग के जीवन से संबंधित पोस्टर भी थे.

‘स्त्री मुक्ति लीग’ की प्रीति ने बताया कि-“वास्तव में 8 मार्च, 1857 को अमेरिका के न्यूयॉर्क शहर में कपड़ा मिल की स्त्री मज़दूरों ने वेतन बढाने और काम के घण्टों को कम करने के लिए एक विशाल प्रदर्शन का आयोजन किया, जिसको वहाँ की पुलिस द्वारा कुचल दिया गया.

इसके दो वर्ष बाद स्त्री मज़दूरों द्वारा पहली यूनियन बनायी गयी. 8 मार्च, 1904 को रेडीमेड मिल व जूता बनाने वाली महिलाओं ने काम के घण्टे 16 से 10 करने की माँग को लेकर आन्दोलन किया जिसमें कई स्त्रियों को जेल जाना पड़ा.”

लेकिन इसके बाद भी संघर्षों और लड़ाइयों का सिलसिला जारी रखते हुए 8 मार्च, 1908 को न्यूयॉर्क में सुई उद्योग की स्त्री मजदूरों ने वेतन बढ़ाने की माँग को लेकर प्रदर्शन किया.

अमेरिका की स्त्रियों के इन संघर्षो को नया आयाम देते हुए 1910 में कोपेनहेगेन में आयोजित अन्तरराष्ट्रीय महिला सम्मेलन में 8 मार्च को जर्मन सामाजिक जनवादी पार्टी की क्रान्तिकारी नेता

क्लारा जेटकिन का अन्तरराष्ट्रीय महिला दिवस के रूप में मनाने के प्रस्ताव को स्वीकार किया गया. 1921 में स्त्रियों के बेमिसाल संघर्षो, कुर्बानियों, बहादुराना लड़ाइयों के चलते इसे सोवियत संघ का राजकीय उत्सव घोषित किया गया.

दिशा छात्र संगठन के अम्बरीश ने कहा कि-“एनसीआरबी की रिपोर्ट के मुताबिक़ 2020 में स्त्री-उत्पीड़न के 49385 मामले दर्ज़ हुए थे जो 2022 में बढ़कर 65743 हो गए.

स्त्रियों के उत्पीड़न में दोषियों को मिलने वाली सज़ा की दर 2021 के 25.2 प्रतिशत की तुलना में 2022 में घटकर 23.3 प्रतिशत हो गयी. राष्ट्रीय महिला आयोग के अनुसार 2019-20 की तुलना में घरेलू उत्पीड़न के मामलों में 2020-21 में 25.09 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

राष्ट्रीय सर्वेक्षण कार्यालय के मुताबिक़ ग्रामीण क्षेत्रों में जहाँ पुरुष मजदूरों की औसत दैनिक मज़दूरी 175.30 रुपये थी, वहीं महिलाओं की औसत दैनिक मज़दूरी सिर्फ़ 108.14 रुपये थी.

इसी तरह शहरी क्षेत्रों में पुरुष मज़दूरों की औसत दैनिक मज़दूरी 276.04 रुपये थी, जबकि महिलाओं की 212.86 रुपये थी. इसलिए 8 मार्च स्त्री-उत्पीड़न के विविध रूपों से लड़ने के लिए हमें प्रेरित करता है. कार्यक्रम में प्रीति, प्रसेन, दीपक, प्रभाकान्त आदि मौजूद रहे.

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