गोरखपुर एम्स में पहली बार मिला ‘बॉम्बे ब्लड ग्रुप’: 10 हजार में एक व्यक्ति में पाया जाने वाला दुर्लभ रक्त समूह

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गोरखपुर: अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (AIIMS) गोरखपुर में डॉक्टरों ने एक अत्यंत दुर्लभ रक्त समूह की पहचान की है। ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की जांच के दौरान 40 वर्षीय महिला में ‘बॉम्बे ब्लड ग्रुप’ पाया गया है। यह रक्त समूह दुनिया के सबसे दुर्लभ ब्लड ग्रुप्स में से एक माना जाता है। भारत में यह लगभग 10 हजार लोगों में से एक में पाया जाता है, जबकि वैश्विक स्तर पर इसकी संभावना लगभग 10 लाख में एक बताई जाती है।

एम्स गोरखपुर के ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग के प्रभारी डॉ. सौरभ मूर्ति के अनुसार भारतीय जनसंख्या में बॉम्बे ब्लड ग्रुप के मामले बहुत कम देखने को मिलते हैं। ऐसे मामलों की पहचान चिकित्सकीय रूप से बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि इस रक्त समूह वाले मरीजों को सामान्य रक्त समूह से रक्त चढ़ाना सुरक्षित नहीं होता।


क्या होता है बॉम्बे ब्लड ग्रुप

बॉम्बे ब्लड ग्रुप को वैज्ञानिक भाषा में “Bombay Phenotype” कहा जाता है। सामान्य तौर पर लोगों में ए, बी, एबी और ओ रक्त समूह पाए जाते हैं। इन सभी में एक एच एंटीजन (H Antigen) मौजूद होता है, जिसके आधार पर रक्त समूह की पहचान होती है।

लेकिन बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले व्यक्तियों में यह एच एंटीजन पूरी तरह अनुपस्थित होता है। इसी कारण यह रक्त समूह सामान्य परीक्षण में अक्सर O ग्रुप जैसा दिखाई देता है।

हालांकि वास्तविकता में यह O ग्रुप नहीं होता। इस रक्त समूह वाले लोगों के शरीर में एंटी-एच एंटीबॉडी बनती है, जिसके कारण यदि इन्हें सामान्य O ग्रुप का रक्त चढ़ा दिया जाए तो गंभीर प्रतिक्रिया हो सकती है


केवल बॉम्बे ब्लड ग्रुप से ही लिया जा सकता है रक्त

डॉक्टरों के अनुसार बॉम्बे ब्लड ग्रुप वाले मरीजों के लिए सबसे बड़ी चुनौती यह होती है कि उन्हें केवल उसी ब्लड ग्रुप के दाता से रक्त मिल सकता है

यानी यदि किसी मरीज का बॉम्बे ब्लड ग्रुप है तो उसे ए, बी, एबी या ओ किसी भी सामान्य ब्लड ग्रुप का रक्त नहीं दिया जा सकता।

इसी वजह से ऐसे मरीजों के लिए ब्लड डोनर की उपलब्धता बेहद मुश्किल हो जाती है। कई बार आपातकालीन स्थिति में मरीजों के लिए सही रक्त ढूंढना चुनौतीपूर्ण हो जाता है।


1952 में मुंबई में हुई थी खोज

बॉम्बे ब्लड ग्रुप की खोज 1952 में मुंबई में हुई थी। इसे भारतीय वैज्ञानिक डॉ. वाई.एम. भेंडे ने पहली बार पहचान किया था।

मुंबई में खोजे जाने के कारण ही इस रक्त समूह का नाम “Bombay Blood Group” रखा गया।

बाद में इसे वैज्ञानिक रूप से Bombay Phenotype (hh) के रूप में वर्गीकृत किया गया।

आज भी दुनिया में इस रक्त समूह वाले लोगों की संख्या बहुत कम है और

इसके लिए अलग से ब्लड डोनर रजिस्ट्रेशन की आवश्यकता पड़ती है।


गोरखपुर एम्स के लिए ऐतिहासिक मामला

एम्स गोरखपुर के इतिहास में यह पहला मामला है जब किसी

मरीज में बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान की गई है।

ट्रांसफ्यूजन मेडिसिन विभाग की टीम ने विस्तृत जांच के बाद इस दुर्लभ रक्त समूह की पुष्टि की।

चिकित्सकों का कहना है कि ऐसे मामलों की पहचान से भविष्य में मरीजों के इलाज और

आपातकालीन स्थिति में रक्त की व्यवस्था करने में मदद मिलती है।

विशेषज्ञों के अनुसार लोगों को समय-समय पर ब्लड ग्रुप की सही जांच करानी चाहिए

ताकि जरूरत पड़ने पर सही रक्त उपलब्ध कराया जा सके।


दुर्लभ रक्त समूह की पहचान क्यों है जरूरी

स्वास्थ्य विशेषज्ञों के मुताबिक दुर्लभ रक्त समूहों की पहचान कई कारणों से महत्वपूर्ण होती है।

  • आपातकालीन स्थिति में सही रक्त उपलब्ध कराना
  • दुर्लभ रक्त समूह के डोनर की पहचान करना
  • भविष्य के इलाज और सर्जरी के दौरान जोखिम कम करना
  • राष्ट्रीय स्तर पर दुर्लभ ब्लड डोनर डेटाबेस तैयार करना

एम्स गोरखपुर में इस मामले की पहचान होने के बाद अब ऐसे रक्त समूहों के लि

डोनर रजिस्ट्रेशन और जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा सकता है।

गोरखपुर एम्स में बॉम्बे ब्लड ग्रुप की पहचान चिकित्सा क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा रही है।

यह मामला न केवल दुर्लभ रक्त समूहों के महत्व को दर्शाता है,

बल्कि यह भी बताता है कि आधुनिक चिकित्सा जांच से

ऐसी असामान्य स्थितियों की समय पर पहचान संभव है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समाज में ब्लड डोनेशन और दुर्लभ रक्त समूहों के प्रति जागरूकता बढ़े, तो

जरूरतमंद मरीजों की जान बचाने में बड़ी मदद मिल सकती है।

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