गोरखपुर में वासंतिक नवरात्र (चैत्र नवरात्रि) हमेशा से एक धार्मिक उत्सव रहा है, लेकिन इस वर्ष 2026 में यह पर्व ऐतिहासिक मोड़ लेने जा रहा है। गोरखपुर के बंगाली समाज ने 118 साल बाद पहली बार मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित करने का फैसला लिया है। अब तक समाज सिर्फ गृह पूजा, हवन और कथा-कीर्तन के माध्यम से नवरात्रि मनाता था, लेकिन इस बार रामलीला मैदान में भव्य मंडप सजाकर मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित की जाएगी। यह आयोजन 22 मार्च से 30 मार्च 2026 तक चलेगा और गोरखपुर के इतिहास में एक नया अध्याय जोड़ेगा।
बंगाली समाज की परंपरा और बदलाव
गोरखपुर में बंगाली समाज की बसावट 19वीं सदी के अंत से है। 1908 से लगातार वासंतिक नवरात्र मनाया जा रहा है, लेकिन दुर्गा पूजा की तरह प्रतिमा स्थापना नहीं होती थी। समाज के बुजुर्गों ने बताया कि पहले सिर्फ कलश स्थापना, अखंड ज्योति और रामायण-दुर्गा सप्तशती पाठ होता था। लेकिन पिछले कुछ वर्षों से युवा पीढ़ी ने मांग की कि गोरखपुर में भी शारदीय नवरात्र की तरह वासंतिक नवरात्र में मां दुर्गा की प्रतिमा स्थापित हो। समाज के अध्यक्ष श्री सुबोध चक्रवर्ती ने कहा, “118 साल की परंपरा में यह पहली बार होगा जब हम मां दुर्गा को प्रतिमा रूप में आमंत्रित करेंगे। यह हमारी सांस्कृतिक विरासत को मजबूत करने का प्रयास है।”
आयोजन की तैयारी और विशेषताएं
रामलीला मैदान में 40 फीट ऊंचा मंडप तैयार किया जा रहा है। मां दुर्गा की 12 फीट ऊंची प्रतिमा कोलकाता के प्रसिद्ध मूर्तिकार से बनवाई जा रही है। प्रतिमा में मां दुर्गा सिंहवाहिनी रूप में होंगी, साथ में गणेश, लक्ष्मी, सरस्वती और कार्तिकेय की मूर्तियां भी स्थापित होंगी। पूजा में बंगाली रीति-रिवाजों का पालन होगा – जैसे संध्या आरती, धुनुची नृत्य, ढोल-नगाड़े और बंगाली भजन। प्रतिदिन सुबह-शाम आरती, भोग और प्रसाद वितरण होगा। नवमी पर कुंभविवाह और दशमी पर विसर्जन होगा।
समाज और शहर की प्रतिक्रिया
गोरखपुर के बंगाली समाज के अलावा स्थानीय लोग भी इस आयोजन से उत्साहित हैं।
कई हिंदू परिवारों ने कहा कि वे मां दुर्गा के दर्शन के लिए रामलीला मैदान आएंगे।
शहर में पहले से ही शारदीय दुर्गा पूजा भव्य होती है, लेकिन वासंतिक नवरात्र में प्रतिमा स्थापना
नया आयाम जोड़ेगा। सोशल मीडिया पर #VasanticNavratriGorakhpur और #BengaliSamajGorakhpur ट्रेंड कर रहे हैं।
सांस्कृतिक महत्व
वासंतिक नवरात्र रामनवमी का पर्व है, जिसमें मां दुर्गा के नौ रूपों की पूजा होती है। बंगाली समाज में
यह पर्व गृह-परिवार में मनाया जाता है, लेकिन प्रतिमा स्थापना से
सामुदायिक स्तर पर उत्सव बढ़ेगा। यह गोरखपुर की सांस्कृतिक विविधता को दर्शाता है,
जहां बंगाली, अवधी, भोजपुरी और अन्य संस्कृतियां साथ-साथ रहती हैं।


