उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले में कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य के किनारे बसे गांवों में मानव-वन्यजीव संघर्ष अब रोजमर्रा की जिंदगी बन चुका है। यहां के ग्रामीण दिन-रात दहशत में जी रहे हैं। जंगली जानवर—खासकर बाघ, तेंदुआ और जंगली सुअर—बार-बार गांवों में घुसकर मवेशी और कभी-कभी इंसानों का शिकार कर लेते हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि माता-पिता अपने बच्चों को स्कूल भेजने से डरने लगे हैं। बच्चे खुलकर खेल नहीं पाते और महिलाएं खेतों में काम करने से कतराती हैं। कतर्नियाघाट के जंगलों से सटे गांवों की यह ग्राउंड रिपोर्ट अजित बिसारिया की नजर से देखी गई सच्चाई है।
मानव-वन्यजीव संघर्ष की हकीकत
कतर्नियाघाट वन्यजीव अभयारण्य नेपाल की सीमा से लगा हुआ है और यहां बाघों की अच्छी संख्या मौजूद है। पिछले कुछ वर्षों में बाघों की आबादी बढ़ने के साथ ही गांवों में घुसपैठ की घटनाएं भी बढ़ी हैं। ग्रामीण बताते हैं कि रात में नींद नहीं आती—कभी तेंदुए की दहाड़, कभी जंगली सुअरों का हमला। दिन में भी खेतों में काम करते समय सतर्क रहना पड़ता है। एक ग्रामीण ने बताया, “सामने ही बच्चे खेल रहे होते हैं और अचानक जंगली जानवर आ जाता है। दिल के टुकड़े हो जाते हैं।”
पिछले 2-3 साल में दर्जनों मवेशी मारे गए हैं। कई बार इंसानों पर भी हमला हुआ, जिसमें कुछ मौतें भी हुईं। इससे किसानों की आर्थिक स्थिति चरमरा गई है। एक गाय या भैंस का मारा जाना परिवार के लिए बड़ा नुकसान है, क्योंकि यही उनकी कमाई का मुख्य साधन है।
बच्चों और महिलाओं पर सबसे ज्यादा असर
सबसे ज्यादा डर बच्चों और महिलाओं में है। अभिभावक कहते हैं कि स्कूल जाने के लिए बच्चे जंगल के किनारे से गुजरते हैं। कई बार रास्ते में जंगली जानवर दिख जाते हैं। इसी कारण कई परिवारों ने बच्चों की पढ़ाई छुड़वा दी है या दूर के स्कूल में भेजना बंद कर दिया। महिलाएं खेतों में अकेले नहीं जातीं। शाम होते ही घरों में सिमट जाती हैं।
गांवों में रात को लाइट जलाकर रखने की सलाह दी जाती है, लेकिन बिजली की अनियमितता भी समस्या बढ़ाती है।
वन विभाग की कोशिशें और ग्रामीणों की मांग
वन विभाग ने फेंसिंग, सोलर लाइट और ट्रेंच बनाकर रोकथाम की कोशिश की है,
लेकिन ग्रामीणों का कहना है कि ये उपाय अपर्याप्त हैं। वे मुआवजे की राशि बढ़ाने, त्वरित राहत और
स्थायी समाधान की मांग कर रहे हैं। कई बार मुआवजा मिलने में महीनों लग जाते हैं।
ग्रामीण चाहते हैं कि वन्यजीवों को गांवों से दूर रखने के लिए
बेहतर बैरिकेडिंग और नियमित पेट्रोलिंग हो। साथ ही, स्थानीय स्तर पर जागरूकता और ट्रेनिंग कैंप भी चलाए जाएं।
क्या है समाधान का रास्ता?
विशेषज्ञों का मानना है कि मानव-वन्यजीव संघर्ष को कम करने के लिए सामुदायिक भागीदारी जरूरी है। वन विभाग,
स्थानीय प्रशासन और ग्रामीणों को मिलकर काम करना होगा। बाघों की आबादी बढ़ना अच्छी बात है, लेकिन
इसके साथ ग्रामीणों की सुरक्षा भी सुनिश्चित करनी होगी।
अगर समय रहते कदम नहीं उठाए गए, तो यह संघर्ष और गहरा सकता है।
बहराइच के इन गांवों की कहानी सिर्फ दहशत की नहीं,
बल्कि संतुलन की है—जंगल और गांव दोनों को बचाने की।
ग्रामीणों की आवाज अब सुनने का वक्त है, ताकि न दिन में चैन छिने और न रात को नींद।

