बांग्लादेश इन दिनों गंभीर अशांति और हिंसा की चपेट में है। दिसंबर 2025 में छात्र नेता शरीफ उस्मान हादी (ओस्मान हादी) की हत्या के बाद देशभर में दंगे, आगजनी और हमले भड़क उठे। भीड़ ने मीडिया हाउस, सांस्कृतिक संस्थानों और अल्पसंख्यकों को निशाना बनाया। यह स्थिति नफरत की आग में जल रही है, जहां कट्टरपंथी तत्व भारत-विरोधी नारे लगा रहे हैं और बहुलवाद को खत्म करने की कोशिश कर रहे हैं।
हादी की मौत ने भड़काई हिंसा
18 दिसंबर 2025 को इंकलाब मंच के संयोजक शरीफ उस्मान हादी की मौत की खबर फैलते ही तनाव चरम पर पहुंच गया। हादी को 12 दिसंबर को गोली मारी गई थी, और वे सिंगापुर में इलाज के दौरान मारे गए। उनकी मौत के बाद दक्षिणपंथी इस्लामी कट्टरपंथी, ऑनलाइन कार्यकर्ता और पाकिस्तान समर्थक तत्वों ने भीड़ को उकसाया। हमले योजनाबद्ध लगते हैं, जैसा कि इस्लामी छात्र शिविर के एक नेता ने जहांगीरनगर यूनिवर्सिटी में कहा – “वामपंथियों, शाहबागी, छायानाट और उदिची को खत्म करना होगा।”
मीडिया संस्थानों पर बर्बर हमले
देश के दो प्रमुख अखबारों प्रोथोम आलो और द डेली स्टार के दफ्तरों पर 18-19 दिसंबर की रात हमला किया गया। भीड़ ने तोड़फोड़ की, आग लगाई और पत्रकारों को फंसाया।
- प्रोथोम आलो का 19 दिसंबर को पहली बार 27 साल में प्रिंट प्रकाशन नहीं हुआ, ऑनलाइन संस्करण भी बंद रहा।
- द डेली स्टार का 33 साल के इतिहास में पहली बार प्रकाशन रुका। पत्रकारों को जान का खतरा था, लेकिन अंतरिम सरकार ने सुरक्षा देने का वादा किया।
न्यू एज के संपादक और एडिटर्स काउंसिल के अध्यक्ष नूरुल कबीर पर भी हमला हुआ। उन्हें “भारतीय एजेंट” कहकर पीटा गया। खुलना में वरिष्ठ पत्रकार इमदादुल हक मिलन (मिलन शालुआ) की गोली मारकर हत्या कर दी गई। वे शालुआ प्रेस क्लब के अध्यक्ष थे।
सांस्कृतिक विरासत पर हमला
राष्ट्रकवि रवींद्रनाथ टैगोर और काजी नजरुल इस्लाम से जुड़े ऐतिहासिक संस्थान छायानाट पर हमला हुआ।
- 7 मंजिला इमारत में घुसकर हर कमरा तोड़ा।
- हारमोनियम, उपकरण, टैगोर की तस्वीरें और किताबें जलाई गईं।
- लालन के चित्र फाड़े गए। छायानाट बंगाली संस्कृति का प्रतीक है, जिसकी स्थापना 1961 में पाकिस्तानी शासन के खिलाफ हुई थी। इसका न्यू ईयर उत्सव यूनेस्को मान्यता प्राप्त है, फिर भी इसे नहीं बख्शा गया।
उदिची शिल्पीगोष्ठी पर भी हमला हुआ। इसकी स्थापना मुक्ति संग्राम के बाद हुई, जहां कलाकारों ने स्वतंत्रता के लिए गीत गाए। 1999 और 2001 में भी इस पर बम हमले हो चुके हैं, लेकिन कट्टरपंथी ताकतें बार-बार हमला करती रही हैं।
अल्पसंख्यकों और निर्दोषों पर अत्याचार
मैमनसिंह (मयमंसिंह) के भालुका में युवा कपड़ा मजदूर दीपू चंद्र दास (दिपु दास) को
“इस्लाम के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी” के आरोप में भीड़ ने पीट-पीटकर मार डाला।
- शव को पेड़ से लटकाकर आग लगा दी गई।
- जांच में ब्लास्फेमी का कोई सबूत नहीं मिला, फिर भी 7-10 लोग गिरफ्तार।
- एक बीएनपी नेता की 7 साल की बेटी भी हिंसा में घायल हुई।
कट्टरपंथ का बढ़ता खतरा और भारत-विरोधी माहौल
पिछले महीनों में सूफी दरगाहों, बाउल सभाओं पर हमले हुए। लड़कियों के फुटबॉल मैच रोके गए।
- पाकिस्तान की सेना के प्रतिनिधिमंडल आए।
- जमात-ए-इस्लामी को सत्ता की उम्मीद। फरवरी 2026 में चुनाव होने हैं,
- लेकिन 400,000 अवैध हथियार, 281 मौतें और 7,689 घायल (अगस्त-सितंबर 2025) से स्थिति चिंताजनक है।
- 89% पत्रकारों को चुनाव के दौरान हमले का डर।
जवाबी संकल्प और उम्मीद की किरण
प्रोथोम आलो और द डेली स्टार फिर प्रकाशित हुए। द डेली स्टार ने बैनर हेडलाइन चलाई – “हम झुकेंगे नहीं!”
संपादकीय में लिखा – “वे हमारे दफ्तर जला सकते हैं, लेकिन संकल्प नहीं।
” सड़कों पर रैलियां, नारे – “बांस की लाठियां तैयार करो / कट्टरपंथ को सबक सिखाओ।
” कवि शम्सुर रहमान की पुकार आज भी गूंज रही है – “कृष्णपक्ष कब खत्म होगा?”
अंतरिम सरकार को निर्णायक कार्रवाई करनी होगी। नागरिकों को बहुलवादी बांग्लादेश के लिए खड़ा होना होगा।
हिंसा की जांच, दोषियों को सजा और प्रेस-संस्कृति की सुरक्षा जरूरी है।
बांग्लादेश लोकतंत्र के रास्ते पर लौट सकता है, लेकिन इसके लिए एकजुटता चाहिए।


