पूर्व मुख्य न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व में बनायी गयी कोलेजियम ने इनकी नियुक्ति की हरी झंडी दी थी और रिटायरमेंट के बाद रंजन गोगोई किस नाले में जाकर गिरे,
यह पूरा देश न केवल जानता है, बल्कि उसने अपनी नंगी आंखों से उसको देखा है. न्यायाधीशों की नियुक्तियों में सरकार जिस तरह से सीधे हस्तक्षेप कर रही है, इतिहास में उसकी कोई दूसरी मिसाल नहीं मिलेगी.
सत्य, न्याय और सेकुलरिज्म के रास्ते पर चलने वाले जजों की संस्तुति वाली फाइलों को दबा दिया जा रहा है और जस्टिस शेखर जैसे लोगों की ऐन-केन प्रकारेण नियुक्तियां करायी जा रही हैं.
यही मौजूदा दौर का सच है और यही इस निजाम की नीति है. इन सज्जन के न केवल काम पर तत्काल रोक लगायी जानी चाहिए, बल्कि इनके अब तक के दिए गए सारे फैसलों की फिर से समीक्षा की जानी चाहिए.
उसके साथ ही इनके खिलाफ महाभियोग लाकर इन्हें पूरी न्यायपालिका से अलग कर दिया जाना चाहिए जिससे इस तरह के लोगों को सबक मिल सके कि जो इस तरह के विचार रखते हैं, उनके लिए न्यायपालिका में कोई स्थान नहीं है.
इस घटना से यह बात समझ में आती है कि न्यायपालिकाओं में इस तरह के लोगों की संख्या बढ़ती जा रही है और संख्या और विचार के स्तर पर यह वर्चस्व का रूप लेती जा रही है, वरना कोई इस तरह की हिम्मत नहीं कर पाता.
समाज में भी कमोबेश इस तरह के घृणित विचारों की स्वीकारोक्ति है. उसी का नतीजा है कि वह खुली सभा में इस तरह की बातों को बोलने की हिम्मत कर सके.
जगह-जगह संस्थाओं में अपने आदमियों यानी अपनी विचारधारा के लोगों को बैठाना संघ का पुराना एजेंडा रहा है. अब जब कि सरकार अपनी है, तो वह शिक्षण संस्थाओं से लेकर
न्यायपालिकाओं और नौकरशाही से लेकर निचली दूसरी महत्वपूर्ण संस्थाओं पर पूरी तरह से कब्जा कर लेना चाहती है, जिससे अपने हाइड्रा रूपी इस विस्तार के साथ पूरी व्यवस्था को ही अपनी गिरफ्त में लिया जा सके,
जिसका आखिरी नतीजा यह होगा कि विरोध में उठने वाली हर आवाज को अभी तो दबाया जा रहा है, आने वाले दिनों में ऐसा करने वालों की जबान काट ली जाएगी.
ऐसे में देश में स्वतंत्रता और आज़ादी का जो मतलब आम नागरिकों के लिए था, वह इतिहास हो जाएगा. इस तरह से देश में गुलामों की नई पौध और पीढ़ी तैयार होगी, जिसे चलने और काम करने के लिए महज एक इशारा ही काफी होगा.
देश में बहिष्करण का जो पूरा अभियान चलाया जा रहा है, वह बेहद खतरनाक है. अभी किसी को लग सकता है कि यह केवल मुसलमानों के खिलाफ केंद्रित है.
लेकिन सच्चाई यह है कि यह दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों और सारे वंचित तबकों के भी खिलाफ है. यहां तक कि यह मध्य वर्ग के एक बड़े हिस्से को भी उसके दायरे से बाहर कर देगा.
अंत में केवल पांच फीसदी के पक्ष में होगा, जिसमें कॉरपोरेट, उच्च मध्य वर्ग और सवर्ण शामिल होंगे. ब्राह्मणवादी हिंदुत्व और कॉरपोरेट की यह जुगलबंदी पूरे देश पर भारी पड़ने जा रही है.
(महेंद्र मिश्र ‘जनचौक’ के संपादक हैं।)
{DISCLAIMER: ये लेखक के निजी विचार हैं. GORAKHPUR HALCHAL का इससे कोई सरोकार नहीं है}


