अमेरिका खतरे में है: विष्णु नागर का तीखा व्यंग्य
विष्णु नागर का यह व्यंग्य लेख अमेरिका की विदेश नीति, इतिहास और वर्तमान राजनीति पर करारा कटाक्ष है। लेखक बताते हैं कि अमेरिका की पहचान ही ‘खतरे में रहना’ है। भारत में पाकिस्तान, चीन या बांग्लादेशी प्रवासियों से खतरा बताया जाता है, लेकिन अमेरिका तो 18वीं सदी से लगातार खतरे में जी रहा है।
अमेरिका का खतरा इतिहास से शुरू
लेखक लिखते हैं कि अमेरिका में गोरे अपराधियों के आने से ही खतरा शुरू हो गया। ब्रिटेन, फ्रांस, स्वीडन, नीदरलैंड से निर्वासित अपराधी पहुंचे तो मूल निवासी रेड इंडियनों से खतरा पैदा हुआ। रेड इंडियनों का सफाया करने के बाद गुलाम बनाकर लाए गए काले लोगों से खतरा। फिर गोरी औरतों से खतरा—1920 में उन्हें आधा-अधूरा मताधिकार मिला, काली औरतों को 45 साल बाद। भारत में 1950 में ही महिलाओं को पूरा मताधिकार मिल गया।
आजकल के खतरे: ईरान से लेकर प्रवासियों तक
आज अमेरिका को ईरान से खतरा है। कल खतरा खत्म हुआ तो वह खुद नया खतरा ढूंढ लेगा। यूरोप से भगाए गए अपराधियों के वंशजों को अब दूसरे देशों के प्रवासियों से खतरा। भारत के लोगों को हथकड़ी-बेड़ियों में वापस भेजा जाता है, लेकिन अमेरिका भारत का सबसे अच्छा दोस्त है—दोस्त का काम दोस्त का अपमान करना होता है!
इस्राइल भी हमेशा खतरे में रहता है। दोनों को चैन से बैठना पसंद नहीं। वेनेजुएला से खतरा था तो राष्ट्रपति को उठाकर ले आए। जहां तेल की लूट का अधिकार खतरे में पड़ता है, वहां अमेरिका खतरे में पड़ जाता है। रूस से सस्ता तेल खरीदने पर भी खतरा। मोदी जी ने रूस से तेल लेना कम कर खतरा दूर किया। ईरान पर हमला हुआ तो मोदी जी ने हां में हां मिलाई।
क्यूबा, रूस, चीन और पड़ोसी देशों से खतरा
1959 की क्यूबा क्रांति से खतरा। फिदेल कास्रो को मारने की कोशिशें नाकाम। आज भी क्यूबा से खतरा। कनाडा, मैक्सिको, कोलंबिया, ब्राजील—सभी पड़ोसी से खतरा। ट्रंप ने कनाडा को 51वां राज्य बनाने की बात कही। सोवियत संघ गया तो अब चीन, रूस, उत्तर कोरिया से स्थायी खतरा। अफ्रीका में नाइजीरिया, साहेल क्षेत्र, चीन-रूस प्रभाव से खतरा।
अमेरिका को खुद से भी खतरा
अमेरिका को अपने आप से खतरा। डेमोक्रेटिक राज्यों से, वोटरों से, विश्वविद्यालयों से खतरा। चींटी, हाथी,
चूहे, कनेर के फूल, बिहार के ठेकुआ, मालपुआ, मध्य प्रदेश का कलाकंद, महाराष्ट्र का श्रीखंड, पावभाजी से खतरा।
हिंदी, भिंडी, गरीब के चिथड़ों से खतरा। लेखक व्यंग्य करते हैं—
इस व्यंग्य से भी अमेरिका को खतरा है, इसे पढ़ने वालों से खतरा है। इतना दयनीय है अमेरिका!
विष्णु नागर का व्यंग्य साहित्य
विष्णु नागर कई पुरस्कारों से सम्मानित साहित्यकार, स्वतंत्र पत्रकार और
जनवादी लेखक संघ के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष हैं। उनका यह लेख अमेरिका की
साम्राज्यवादी नीतियों, दोहरे मापदंड और भारत-अमेरिका संबंधों पर तीखा व्यंग्य है।
यह पाठकों को सोचने पर मजबूर करता है कि ‘खतरा’ की राजनीति कैसे दुनिया भर में फैलाई जाती है।
यह व्यंग्य अमेरिका की छवि को उलट-पुलट कर पेश करता है—जहां खतरा न हो,
वहां खुद खतरा पैदा कर लिया जाता है। पढ़िए और सोचिए—क्या अमेरिका वाकई हमेशा खतरे में है


