गोरखपुर की सांस्कृतिक धरोहर एक बार फिर देशभर में छा गई। हाल ही में आयोजित एक राष्ट्रीय स्तर के लोक नृत्य प्रतियोगिता में गोरखपुर के कलाकारों ने फरुवाही नृत्य की शानदार प्रस्तुति देकर पूरे पूर्वांचल का नाम रोशन किया। इस प्रतियोगिता में देश के विभिन्न राज्यों की पारंपरिक कलाओं में हिस्सा लेते हुए गोरखपुर की टीम ने तीसरा स्थान हासिल किया। यह उपलब्धि न केवल गोरखपुर के लिए गर्व का विषय है, बल्कि फरुवाही नृत्य जैसी दुर्लभ आदिवासी कला को राष्ट्रीय मंच पर पहचान दिलाने में बड़ी सफलता है।
फरुवाही नृत्य क्या है?
फरुवाही नृत्य उत्तर प्रदेश के गोरखपुर और आसपास के क्षेत्रों में रहने वाले थारू आदिवासी समुदाय की एक प्राचीन लोक कला है। यह नृत्य मुख्य रूप से फसल कटाई, विवाह, त्योहारों और सामूहिक उत्सवों के दौरान किया जाता है। नृत्य में पुरुष और महिलाएं एक साथ भाग लेते हैं, जहां महिलाएं रंग-बिरंगे परिधान और आभूषण पहनकर, जबकि पुरुष ढोल-नगाड़े और मंजीरे के साथ ताल देते हैं। नृत्य की विशेषता है तेज गति, चक्राकार घूमना, हाथों की लयबद्ध मुद्राएं और सामूहिक एकता का प्रदर्शन। फरुवाही नृत्य में गीत भी थारू भाषा में होते हैं, जो प्रकृति, प्रेम और सामाजिक जीवन से जुड़े होते हैं।
यह नृत्य न सिर्फ मनोरंजन करता है, बल्कि थारू संस्कृति की पहचान, एकता और सामूहिकता को भी दर्शाता है। दुर्भाग्य से आधुनिक जीवनशैली के कारण यह कला धीरे-धीरे लुप्त होने की कगार पर थी, लेकिन गोरखपुर के युवा कलाकारों और सांस्कृतिक संगठनों ने इसे पुनर्जीवित किया।
राष्ट्रीय प्रतियोगिता में गोरखपुर की शानदार जीत
राष्ट्रीय लोक कला महोत्सव (नेशनल फोक आर्ट फेस्टिवल) में देश के 15 राज्यों ने अपनी पारंपरिक कलाओं के साथ भाग लिया। गोरखपुर की टीम ने फरुवाही नृत्य की 12 मिनट की प्रस्तुति दी, जिसमें 25 कलाकारों ने अपनी ऊर्जा और समर्पण से सभी को मंत्रमुग्ध कर दिया। निर्णायकों ने टीम की एकता, परिधानों की प्रामाणिकता, संगीत की लय और नृत्य की मौलिकता की जमकर तारीफ की।
परिणामस्वरूप गोरखपुर की टीम को तीसरा स्थान मिला। पहले स्थान पर राजस्थान की घूमर और दूसरे स्थान पर ओडिशा की छऊ नृत्य रही। गोरखपुर के लिए यह उपलब्धि ऐतिहासिक है, क्योंकि पहली बार फरुवाही नृत्य को राष्ट्रीय स्तर पर इतना बड़ा मंच और सम्मान मिला।
गोरखपुर और थारू समुदाय में खुशी की लहर
इस जीत पर गोरखपुर शहर और थारू बस्तियों में उत्सव का माहौल है।
टीम के नेता और प्रमुख नृत्य निर्देशक रामलखन थारू ने कहा
, “यह जीत सिर्फ हमारी नहीं, पूरे थारू समाज और गोरखपुर की सांस्कृतिक धरोहर की है।
अब फरुवाही नृत्य को और ज्यादा लोग जानेंगे और यह कला लुप्त नहीं होगी।”
स्थानीय कलाकारों का कहना है कि इस सफलता से युवाओं में अपनी संस्कृति के प्रति रुचि बढ़ेगी।
कई स्कूलों और कॉलेजों में अब फरुवाही नृत्य को सांस्कृतिक कार्यक्रमों में शामिल किया जा रहा है।
आगे की राह: संरक्षण और प्रचार
यह उपलब्धि गोरखपुर प्रशासन और सांस्कृतिक संगठनों के लिए एक चुनौती भी है।
फरुवाही नृत्य को संरक्षित करने के लिए प्रशिक्षण शिविर, वर्कशॉप और सरकारी सहायता की जरूरत है।
उम्मीद है कि इस जीत से फरुवाही नृत्य को पर्यटन और सांस्कृतिक मंचों पर और अधिक बढ़ावा मिलेगा।
गोरखपुर ने एक बार फिर साबित किया कि पूर्वांचल की मिट्टी में छिपी कलाएं देश को गौरवान्वित कर सकती हैं।
फरुवाही नृत्य की यह सफलता आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनेगी।
जय गोरखपुर! जय थारू संस्कृति!

