आरएसएस के 100 साल: भागवत का कोलकाता भाषण और हिंदू राष्ट्र का खतरनाक दावा

आरएसएस के 100 साल आरएसएस के 100 साल

कोलकाता में आरएसएस के सौ साल पूरे होने के मौके पर मोहन भागवत का भाषण सुनकर पहली नजर में लग सकता है कि यह पुरानी लफ्फाजी का दोहराव है – “भारत हिंदू राष्ट्र था, है और रहेगा”। लेकिन थोड़ा गौर से सुनें तो इसकी खतरनाक अर्थ-ध्वनियां साफ सुनाई देती हैं। भागवत ने पहली बार हिंदू राष्ट्र के दावे को सीधे भारतीय संविधान के सामने खड़ा कर दिया। संविधान जो स्पष्ट रूप से भारत को धर्मनिरपेक्ष, बहुलतावादी राष्ट्र घोषित करता है।

भागवत ने कहा – “अगर संसद कभी संविधान में संशोधन कर वह शब्द जोड़ने का फैसला करती है…”, यानी ‘हिंदू राष्ट्र’। लेकिन तुरंत जोड़ा – “संसद ऐसा न भी करे, तो हमें कोई फर्क नहीं पड़ता। हमें उस शब्द की परवाह नहीं, क्योंकि हम हिंदू हैं और हमारा राष्ट्र हिंदू राष्ट्र है। यही सच्चाई है।” यह शाब्दिक कसरत का मतलब साफ है – आरएसएस संविधान के खिलाफ भी हिंदू राष्ट्र मानता है और बनाने के लिए काम करेगा। संविधान बदलना भी एक विकल्प है, लेकिन जरूरी नहीं।

मोदी-शाह की दोहरी चाल: क्रिसमस पर हमला और मनरेगा खत्म

साल के उसी अंतिम पखवाड़े में मोदी-शाह सरकार क्या कर रही थी? ईसाइयों के सबसे बड़े त्योहार क्रिसमस पर हमले को सामान्य बनाने की कोशिश। केंद्र ने 25 दिसंबर को क्रिसमस की जगह ‘सुशासन दिवस’ मनाने की शुरुआत की थी, जिसे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों में क्रिसमस की छुट्टी ही रद्द कर अटल बिहारी वाजपेयी जन्मदिन पर स्कूल बुलाए गए। प्रधानमंत्री ने लखनऊ में 230 करोड़ का ‘राष्ट्रीय प्रेरणा स्थल’ उद्घाटन किया।

दूसरी ओर संघ परिवार के संगठनों ने क्रिसमस पर हमले तेज किए।

असम, छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, दिल्ली, ओडिशा, राजस्थान, उत्तराखंड में क्रिसमस सजावट तोड़-फोड़, हमले।

छः गुना बढ़ोतरी। गोलवलकर की किताबों में लिखा है कि हिंदू राष्ट्र में अल्पसंख्यक अदृश्य रहें। यह अभ्यास जारी है।

मनरेगा खत्म, कॉरपोरेट के लिए रास्ता

संसद से मनरेगा कानून खत्म कर ‘वीबी-जी राम जी योजना’ लाई गई। यह तीन कृषि कानूनों की पुनरावृत्ति है –

मजदूरों को सस्ता बनाकर बड़े भूस्वामियों और कॉरपोरेट को फायदा।

श्रम कानूनों को पहले ही ध्वस्त किया जा चुका है।

2026 का अंधेरा या उम्मीद?

भागवत ने संविधान बदलने की संभावना जताई, लेकिन कहा कि जरूरी नहीं।

मोदी-शाह की सरकार ने संस्थाओं पर कब्जा कर लिया। चुनाव आयोग, अदालतें – सब पर प्रभाव।

लेकिन अंधेरा नहीं। मजदूर, किसान, दलित, पिछड़े, महिलाएं,

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