केवल पच्चीस वर्षों का जीवन, फिर भी उसका फलक काफी व्यापक है. जिस मुंडा समुदाय में उनका जन्म हुआ,
जिस भूमि से उनका जुड़ाव रहा और जिन संघर्षों का उन्होंने नेतृत्व किया-ये सब उनके दायरे को सीमित नहीं कर सके.
उनका नाम पूरे देश में गूंज रहा है, आदिवासी समुदायों के लिए, बिरसा मुंडा ‘धरतीआबा’ हैं, निरंतर प्रतिरोध के प्रतीक हैं.
‘धरतीआबा’ का शाब्दिक अर्थ है ‘पृथ्वी का पिता’, जो वास्तव में एक व्यापक अभिव्यक्ति है-जो लोगों, प्रकृति और भूमि के बीच गहरे बंधन को दर्शाता है.
शासकों के लिए, उनका नाम एक मुहर बन गया है. झारखंड के विभिन्न शहरों और यहाँ तक कि राजधानी दिल्ली में भी उनकी मूर्तियाँ और चित्र स्थापित हैं.
उनका जन्मदिन, 15 नवंबर, जन जातीय गौरव दिवस के रूप में मनाया जाता है. यह झारखंड का स्थापना दिवस भी है.
सत्तारूढ़ दल उनका इस्तेमाल, मुख्यतः आदिवासी समुदायों पर अपने कुशासन को सही ठहराने के लिए, करते रहे हैं.
वे उन्हें एक आदिवासी नायक के रूप में महिमामंडित करते हैं लेकिन उन्हीं अन्यायों को जारी रखते हैं, जिनके लिए बिरसा लड़े और जिनके लिए वे एक नेता बने और शहीद हुए.
उनके संघर्ष के केंद्र में ज़मीन और जंगल पर लोगों के अधिकार, सांस्कृतिक स्वतंत्रता और एक नैतिक, पर्यावरण-केंद्रित सामाजिक व्यवस्था थी.
जो औपनिवेशिक आधुनिकता और बहुसंख्यकवादी धार्मिक राजनीति से अलग थी. इस संदर्भ में, हम बिरसा की दार्शनिक दृष्टि पर संक्षेप में विचार करेंगे-
हमें बिरसा के संघर्ष पर नए सिरे से विचार करने की ज़रूरत है क्योंकि उनके आदर्श सीधे तौर पर ज़मीन, जंगल और आजीविका के अधिकारों से जुड़े हैं.
आज भी झारखंड, छत्तीसगढ़, ओडिशा और पूर्वी भारत के कई आदिवासी इलाकों में कॉर्पोरेट खनन, औद्योगिक परियोजनाओं और बाँध निर्माण के कारण समुदायों को विस्थापन का सामना करना पड़ रहा है.
यह वास्तविकता बिरसा के समय के अंग्रेज़ ज़मींदारों और ‘दीकुओं’ के आधुनिक स्वरूप को दर्शाती है.
लोग बताते हैं कि बिरसा ने एक बार घोषणा किया था, “हमारी ज़मीन हमारी माँ है, इसे बेचना अपनी आत्मा बेचने के समान है.”
इस बात का कोई दस्तावेज़ी प्रमाण नहीं है कि उन्होंने वास्तव में ऐसा कहा था, शायद लोगों ने समय के साथ इसे मौखिक रूप से गढ़ा हो.
फिर भी, यही बिरसा की सफलता है कि जिस तरह से उन्होंने सोचा, लोगों ने उसी तरह से सोचना सीखा.
यही कारण है कि आज आदिवासी कई वन और पर्यावरण संरक्षण आंदोलनों में अग्रणी भूमिका निभाते हैं.
बिरसा ने जिस पारिस्थितिक न्याय की भावना का आह्वान किया था, उसने वर्तमान जलवायु संकट में नया अर्थ ग्रहण कर लिया है.
मैंने पहले कहा है, बिरसा मुंडा ने केवल ज़मीन के लिए लड़ाई नहीं लड़ी बल्कि आदिवासी सम्मान के संघर्ष को एक विकसित दार्शनिक-सांस्कृतिक रूप भी दिया.
यह एक ऐसा संघर्ष था, जिसने वर्चस्ववादी संरचना के विरुद्ध जनता के व्यापक, जीवंत विचार को अभिव्यक्त किया.
आज यह विरोधाभास और भी तीव्र हो गया है. हालाँकि अंग्रेज़ चले गए हैं, तथाकथित मूल निवासी शासकों ने आदिवासी दर्शन को विस्थापित कर दिया है
और आदिवासी संस्कृति को एक क्रय-योग्य वस्तु में बदल दिया है. इस प्रकार, आदिवासी भाषाएँ, नृत्य,
गीत और पहनावे को लोक संस्कृति के रूप में विस्थापित किया जा रहा है, जबकि उनके जीवंत राजनीतिक अर्थ को छुपाया जा रहा है.
सरकारी आयोजनों में आदिवासी नृत्य का प्रदर्शन किया जा सकता है, जबकि आदिवासी भाषाओं और शिक्षा के बजट में कटौती की जा रही है.
उनकी पहचान को संस्कृति से अलग किया जाता है और दोनों को नुकसान पहुँचाया जाता है. इस प्रक्रिया को सही मायने में सांस्कृतिक उपनिवेशवाद कहा जा सकता है.
संस्कृति को सजाया जाता है और उसका प्रदर्शन किया जाता है, लेकिन उसके अर्थ और शक्ति को छीन लिया जाता है.
बिरसा का मूल संदेश था कि अपनी संस्कृति का होना, अपने पास नियंत्रण के अधिकार का होना है.
बिरसा ने अपना अलग धर्म बनाया, न हिंदू, न ईसाई, बल्कि यह एक आदिवासी लोक का नवीकरण था.
आज के भारत में, जहाँ धर्म के आधार पर ध्रुवीकरण तेज़ी से बढ़ रहा है, बिरसा का रुख़ बेहद महत्वपूर्ण है.
उन्होंने बाहरी धर्मों को नफ़रत के कारण नहीं नकारा क्योंकि उनकी अस्वीकृति आत्म-सम्मान और आत्म-पहचान में निहित थी.
उनका धर्म एक ईश्वर के विचार की पुष्टि करता था, लेकिन एक ऐसा ईश्वर, जो ज़मीन, पेड़ों और समुदाय और पर्यावरण-केंद्रित एकेश्वरवाद से जुड़ा था.
इसके विपरीत, हिंदू धर्म, ईसाई धर्म, इस्लाम और अन्य धर्मों में, उन्होंने मनुष्यों को व्यापक प्राकृतिक दुनिया से
अलग करने और ईश्वर को सबसे ऊपर रखने की प्रवृत्ति देखी. उनके दर्शन में, ईश्वर, मनुष्य, पहाड़ और नदियाँ,
सभी समान रूप से हिस्सेदारी करते हैं और कोई भी सर्वोच्च नहीं है. आज भी, उनके विचार हमें सिखाते हैं कि
धर्म का असली उद्देश्य मानवीय गरिमा, मानव और प्राकृतिक अस्तित्व का संतुलन है न कि विभाजन.


