राजगृह नगरी का समय था. चारों ओर बुद्ध की ख्याति फैल चुकी थी. दूर-दूर से लोग उनकी वाणी सुनने आते थे. लेकिन कुछ लोग उनकी शिक्षाओं को चुनौती देने के लिए भी आते थे.
एक दिन, राजा बिंबिसार ने बुद्ध से पूछा –लोग कहते हैं कि आपके पास कोई अलौकिक शक्ति है. क्या वास्तव में आपके पास कोई जादू है जिससे आप सबको प्रभावित कर लेते हैं?
इसका जवाब देते हुए बुद्ध मुस्कुराकर बोले–अगर कोई शक्ति है तो वह केवल मन की शांति और सही दृष्टि है जो मन को जीत लेता है, वह पूरी दुनिया को जीत लेता है.
राजा यह सुनकर चकित हुए और सोचने लगे कि केवल मन की शांति से कैसे जीवन बदल सकता है?
एक क्रोधित व्यक्ति की चुनौती-
उसी समय नगर में एक ब्राह्मण रहता था. वह बुद्ध से ईर्ष्या करता था. उसने सोचा –
“यह साधु मेरे यज्ञ और पूजा को महत्वहीन बना रहा है. मुझे इसे लोगों के सामने नीचा दिखाना होगा.”
वह बुद्ध के पास आया और सभा में खड़े होकर ऊँची आवाज़ में बोला–गौतम! तुमने मेरा धर्म बिगाड़ दिया है. तुम मूर्ख हो, ढोंगी हो, लोग तुम्हारी बातों में क्यों बहकते हैं?”
उसने बुद्ध को तरह-तरह से गालियाँ दीं. सभा शांत हो गई, लोग देखने लगे कि बुद्ध क्या उत्तर देंगे.
बुद्ध स्थिर बैठे रहे, उनके चेहरे पर मुस्कान थी. जब ब्राह्मण चुप हुआ, तब बुद्ध ने धीरे से पूछा–यदि कोई व्यक्ति किसी को उपहार दे और वह न ले, तो वह उपहार किसके पास रहता है?”
ब्राह्मण बोला–स्वाभाविक है, देने वाले के पास ही. ठीक वैसे ही, तुम्हारी ये गालियाँ मैंने स्वीकार नहीं कीं, ये तुम्हारे पास ही रहेंगी.”
सभा में सन्नाटा छा गया. लोग समझ गए कि सच्ची शक्ति क्रोध का उत्तर क्रोध से नहीं, बल्कि शांति से देना है.
ब्राह्मण का चेहरा उतर गया, उसकी आँखों से आँसू निकल आए. उसने कहा कि मैंने आपको अपमानित करना चाहा पर आप तो और ऊँचे हो गए, मुझे क्षमा करें.
बुद्ध ने कहा –क्षमा वही कर सकता है जिसके मन में क्रोध नहीं. जो अपमान सुनकर भी शांत रहता है, वही सच्चा वीर है. बाहुबल से नहीं, बल्कि धैर्य और समझ से जीवन बदलता है.
तभी कहानी में दूसरा मोड़ भी आ जाता है. यह घटना देखकर एक युवा भिक्षु ने बुद्ध से पूछा–अगर हर बार हम चुप रहेंगे तो लोग हमें कमजोर समझेंगे.
बुद्ध ने कहा-चुप रहना कमजोरी नहीं है. जब अंदर क्रोध उठे और तुम उसे जीत लो, तभी तुम मजबूत हो. अगर तुम क्रोध के वश में होकर उत्तर दो, तो तुम अपने ही दुश्मन बन जाते हो.
बुद्ध ने इस तथ्य को एक उदाहरण के जरिये बताया कि-मान लो, आग लगी है. अगर तुम उस पर तेल डालोगे, तो आग बढ़ेगी.
लेकिन अगर तुम पानी डालो या कुछ न करो, तो आग अपने आप बुझ जाएगी. वैसे ही, क्रोध को जवाब न दो, वह बुझ जाएगा.
उस दिन राजा बिंबिसार ने सबके सामने कहा–आज मैंने जाना कि असली ताकत तलवार या सेना में नहीं है. असली ताकत मन पर विजय पाने में है.
सभा में बैठे लोग इस शिक्षा से गहराई से प्रभावित हुए. कई लोग उसी दिन बुद्ध के शिष्य बन गए.
कहानी हमें सीखाती है कि अपमान का उत्तर अपमान से देने पर केवल शत्रुता बढ़ती है. सच्चा बलवान वही है जो अपने मन और क्रोध को नियंत्रित कर सके.
क्षमा और शांति, जीवन का सबसे बड़ा हथियार है. अगर हम प्रतिक्रिया न दें, तो दूसरे का क्रोध उसी के पास लौट जाता है. असली विजय बाहर की नहीं, भीतर की होती है.
✨ निष्कर्ष
बुद्ध का असली संदेश है कि जीवन में कई बार लोग हमें अपमानित करेंगे, चिढ़ाएँगे, गुस्सा दिलाएँगे। अगर हम शांत रहे और उत्तर न दें, तो उनकी नकारात्मकता उनके पास ही रह जाएगी।
👉 यही बुद्ध का असली संदेश है –
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