(के.एन. साहनी)
देश में बढ़ते धार्मिक तनाव और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण को देखते हुए पूर्वांचल गांधी डॉ. संपूर्णानंद मल्ल ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को पत्र लिखकर सार्वजनिक स्थानों से सभी धार्मिक झंडे, मंदिर, मस्जिद और मूर्तियों को हटाने की मांग किया है.
उन्होंने इस पत्र की एक प्रति सर्वोच्च न्यायालय को भी भेजा है, जिसमें उन्होंने सार्वजनिक स्थलों पर किसी भी धार्मिक प्रतीक को स्थापित करने को ‘धार्मिक अपराध’ घोषित करने की सिफारिश की है.
डॉ. मल्ल ने अपने पत्र में लिखा है कि भारत की आजादी किसी मंदिर, मस्जिद, मूर्ति या झंडे के कारण नहीं मिली, बल्कि यह हिंदू और मुसलमान दोनों की कुर्बानियों का नतीजा है.
आज भाजपा) और आरएसएस नफरत का ज़हर घोल रहे हैं, जिससे यह देश अब गांधी, भगत सिंह, अंबेडकर, एपीजे अब्दुल कलाम और 145 करोड़ भारतीयों का नहीं लगता.
धार्मिक आयोजनों पर सवाल उठाते हुए इन्होंने पूछा है कि, “अगर सड़क पर कुछ मिनट की नमाज नहीं हो सकती है तो जुलूस कैसे?”
यदि मुसलमानों को सड़कों पर नमाज पढ़ने की अनुमति नहीं दी जा रही है तो फिर हिंदू समुदाय के धार्मिक जुलूस, मूर्ति विसर्जन और अन्य आयोजनों की अनुमति क्यों दी जाती है?
उन्होंने आरोप लगाया कि “नमाज पढ़ने वाले लोग कम से कम गाली नहीं देते, लेकिन हिंदुत्ववादी उग्रवादी जुलूसों में अश्लील और भद्दे गाने बजाए जाते हैं, गालियां दी जाती हैं और सांप्रदायिक उकसावे की घटनाएं होती हैं.”
डॉ. मल्ल ने मांग किया है कि देश की सड़कों, सार्वजनिक स्थलों और सरकारी परिसरों से सभी धार्मिक झंडे—चाहे वे भगवा, हरे या काले रंग के हों—हटाए जाएं.
साथ ही, मंदिर, मस्जिद, मूर्तियां और अन्य धार्मिक प्रतीकों को भी वहां से हटाने का आदेश दिया जाए. उन्होंने सुझाव दिया कि धार्मिक प्रतीकों को लोग अपने घरों या निजी स्थानों पर स्थापित कर सकते हैं, लेकिन सार्वजनिक स्थानों पर ऐसा करने की अनुमति नहीं होनी चाहिए.
अपनी बात को मजबूती देने के लिए इन्होंने सर्वोच्च न्यायालय और सरकार से हस्तक्षेप की भी अपील करते हुए लिखा कि यदि सरकार वास्तव में धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखना चाहती है, तो उसे इस प्रस्ताव पर गंभीरता से विचार करना चाहिए. सरकार इस मुद्दे पर कानून बनाए और इसे ‘धार्मिक अपराध’ घोषित करे.
पत्र को लेकर उठा विवाद, पक्ष-विपक्ष में बंटी प्रतिक्रियाएं:
डॉ. मल्ल के इस पत्र के सार्वजनिक होने के बाद राजनीतिक और धार्मिक संगठनों में खलबली मच गई है. हिंदू संगठनों ने इस पत्र को हिंदू विरोधी करार दिया है और इसे धर्मनिरपेक्षता की आड़ में हिंदुत्व पर हमला बताया है.
विहिप (विश्व हिंदू परिषद) और बजरंग दल ने इसे “हिंदू परंपराओं के खिलाफ साजिश” बताते हुए कड़ा विरोध जताया है. भाजपा नेताओं ने इस पत्र को “राजनीति से प्रेरित” बताते हुए कहा कि डॉ. मल्ल सिर्फ सुर्खियों में बने रहने के लिए ऐसे बयान दे रहे हैं.
जबकि सामाजिक कार्यकर्ताओं और धर्मनिरपेक्ष संगठनों ने इसे “सांप्रदायिकता खत्म करने की दिशा में एक साहसिक कदम” बताया है. कुछ बुद्धिजीवियों ने कहा कि “अगर वाकई सरकार सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करना चाहती है, तो इस प्रस्ताव पर विचार होना चाहिए.”
कई मुस्लिम संगठनों ने भी इस मांग का समर्थन करके कहा है कि “यदि सार्वजनिक स्थानों पर नमाज की अनुमति नहीं है, तो धार्मिक जुलूसों और मूर्ति विसर्जन पर भी रोक लगनी चाहिए.”
अब देखना है कि क्या सरकार इस मांग पर विचार करेगी? क्योंकि डॉ. मल्ल की मांग भले ही विवादित हो, लेकिन इसने एक नई बहस को जन्म दे दिया है.
क्या सरकार इस मुद्दे पर कोई कदम उठाएगी? क्या सर्वोच्च न्यायालय इस पर कोई निर्देश देगा? यह देखने वाली बात होगी. फिलहाल, इस मुद्दे पर पूरे देश में चर्चा गर्म है.

